आस्ट्रेलिया के प्रधानमन्त्री की मुसलमानों से अपील

कैनबरा,12 सितम्बर. 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका पर हुये आतंकवादी आक्रमण की पाँचवीं वर्षगाँठ पर अपने देश की जनता को सम्बोधित करते हुये आस्ट्रलिया के प्रधानमन्त्री जॉन हावर्ड ने कहा है कि कोई भी सभ्य मुसलमान आतंकवाद का समर्थन नहीं कर सकता साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि मुसलमानों को इजरायल के अस्तित्व को स्वीकार कर लेना चाहिये.      उधर आस्ट्रलिया के मुस्लिम नेताओं ने श्री हावर्ड के इस भाषण की आलोचना करते हुये कहा है कि प्रधानमन्त्री को मुसलमानों को आलोचना के लिये चिन्हित नहीं करना चाहिये.  एक अन्तरराष्ट्रीय समाचार एजेन्सी के साथ बातचीत में आस्ट्रेलिया की इस्लामिक फ्रेन्डशिप एसोसिएशन के अध्यक्ष कैसर त्राड ने इस बात पर अफसोस जताया कि प्रधानमन्त्री समुदायों में समन्वय स्थापित करने के स्थान पर मुस्लिम समाज पर निशाना साध रहे हैं.       कैनबरा में आयोजित आतंकवादी आक्रमण की वर्षगाँठ पर जॉन हावर्ड ने आतंकवाद के विरूद्ध युद्ध में अपने देश की प्रतिबद्धता दुहराते हुये कहा कि पाँच वर्ष पूर्व सामान्य वैश्विक मूल्यों पर आक्रमण हुआ था.       ज्ञातव्य हो कि दो सप्ताह पूर्व आस्ट्रेलिया के प्रधानमन्त्री ने स्पष्ट घोषणा की थी कि देश के मुसलमानों का एक वर्ग देश के साथ आत्मसात नहीं हो पा रहा है. जॉन हावर्ड के इस बयान पर भी मुस्लिम नेताओं ने तीखी प्रतिक्रया व्यक्त की थी.

वन्देमातरम् पर आपत्ति

एक बार फिर वन्देमातरम् विवादों में है. कारण वही पुरानी इस्लामी जिद कि हमारे लिये देश से बढ़कर धर्म है. हालिया विवाद का आरम्भ उस समय हुआ जब मानव संसाधन मन्त्रालय की ओर से एक शासनादेश जारी कर वन्देमातरम् की रचना के शताब्दी समारोहों को समस्त देश में मनाने के उद्देश्य से समस्त विद्यालयों को आदेशित किया गया कि 7 सितम्बर को उनके यहाँ वन्देमातरम् के दो प्रारम्भिक चरण अनिवार्य रूप से गवाये जायें. इस शासनादेश के जारी होते ही मुस्लिम संगठनों और उलेमाओं ने वन्देमातरम् को इस्लाम के विरूद्ध बताते हुये कहा कि इसे गाते समय उन्हें भारतमाता की आराधना करनी होगी जबकि उनका धर्म अल्लाह और रसूल के अतिरिक्त किसी अन्य की प्रशंसा या आराधना की अनुमति नहीं देता. वन्देमातरम् के अनिवार्य गायन पर आपत्ति करने वालों में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य जफरयाब जिलानी प्रमुख थे फिर उनका अनुसरण किया दिल्ली के शाही इमाम अहमद बुखारी ने. आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड मुसलमानों का प्रतिनिधि संगठन है इसलिये उसके प्रतिनिधि द्वारा वन्देमातरम् न गाने की बात करने से यह स्पष्ट होता है कि आम मुसलमान इसी विचार का है. मुसलमानों द्वारा वन्देमातरम् गाने की अनिवार्यता पर आपत्ति उठाये जाते ही मानव संसाधन मन्त्री ने कहा कि इसे गाना अनिवार्य नहीं है. अब सवाल यह है कि क्या देशभक्ति या राष्ट्रीय कर्तव्य से जुड़े प्रश्नों का निर्धारण भी वोट बैंक को ध्यान में रखकर किया जायेगा. आखिर किस स्तर तक इस देश में इस्लामी हठधर्मिता स्वीकार की जायेगी. वैसे वन्देमातरम् को इस्लामी हठधर्मिता के समस्त नतमस्तक कराने का श्रेय भी कांग्रेस और उसके दो महापुरूषों महात्मा गाँधी और जवाहर लाल नेहरू को ही जाता है. 1923 में काग्रेस के काकीनाडा अधिवेशन में जब मुस्लिम प्रतिनिधियों ने इसे इस्लाम विरोधी बताकर इसे न बजाने की माँग की और सम्मेलन से बाहर आकर कान में अंगुली डालकर खड़े हो गये तो भी कांग्रेस ने इस विभाजनकारी विषाक्त मानसिकता के मनोविज्ञान को पहचानने के स्थान पर उसे प्रश्रय ही दिया. आज एक बार पुन: कांग्रेस वही भूल दुहराने जा रही है और राष्ट्र में ही एक और उपराष्ट्र निर्मित करने वाले तत्वों के समस्त नतमस्तक हो रही है. वन्देमातरम् न गाने का हठधर्मितापूर्ण निर्णय भारत के मुसलमानों और उनके जनमत निर्माताओं को कटघरे में खड़ा करता है जो आधे-अधूरे मन से राष्ट्रभक्ति की कसमें खाते हैं. इस घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में उस सम्मेलन की चर्चा करना भी समीचीन प्रतीत हो रहा है जो 20 और 21 सितम्बर को संसद भवन में जमायत-उलेमा-हिन्द की पहल पर आतंकवाद के विषय पर आयोजित की गई थी. इस सम्मेलन में देश के अनेक प्रमुख उलेमा आये थे. सम्मेलन में सरकार की ओर से पहले दिन सूचना प्रसारण मन्त्री और दूसरे दिन गृहमन्त्री और स्वयं प्रधानमन्त्री ने भाग लिया. इस सम्मेलन में दर्शक के रूप में उपस्थित रहे लोगों के अनुसार दोनों ही दिन मुस्लिम प्रतिनिधियों की बात से ऐसा नहीं लगा कि वे इस्लामी आतंकवाद का प्रतिरोध करने के प्रति गम्भीर हैं. पहले दिन उनका सारा जोर मीडिया को कोसने में लगा और कुछ प्रतिनिधियों ने तो मीडिया को अमेरिका और इजरायल का जासूस और दलाल की संज्ञा दे डाली. इन प्रतिनिधियों के अनुसार मीडिया मुसलमानों को बदनाम कर रहा है. प्रतिनिधियों ने सूचना प्रसारण मन्त्री से आग्रह किया कि मीडिया पर अंकुश लगाया जाये क्योंकि वे मदरसों और मस्जिदों को आतंकवाद का केन्द्र बता रहे हैं. इस पूरी बहस में आतंकवाद की धार्मिक प्रेरणा, उसके समाधान को लेकर कोई पहल मुस्लिम उलेमाओं की ओर से नहीं हुई. केवल प्रलाप हुआ कि मुसलमानों का उत्पीड़न हो रहा है , उनकी छवि खराब की जा रही है. सम्मेलन के दूसरे दिन वही घिसा-पिटा प्रस्
ाव कि इस्लाम में हिंसा के लिये कोई स्थान नहीं है और सभी उपस्थित प्रतिनिधि आतंकवादी कृत्य की निन्दा करते हैं. अच्छा होता इन कर्मकाण्डी प्रस्तावों से परे कुछ ऐसा ठोस और दीर्घगामी कदम ये लोग उठाते जो इनकी ईमानदारी को पुष्ट करता. आखिर आज तक दुनिया के किसी भी कोने में आतंकवाद के विरूद्ध मुसलमानों की वैसी रैली क्यों नहीं आयोजित हो सकी जैसी पैगम्बर के कार्टून के प्रकाशित होने पर या अमेरिकी राष्ट्रपति के भारत आगमन पर हुई थी. आखिर यही उलेमा मुस्लिम जनमानस को आतंकवाद के विरूद्ध आन्दोलित करने मे क्यों असफल हैं या तो मुसलमान इस सम्बन्ध में उनसे सहमत नहीं है या फिर उलेमा स्वयं आतंकवादियों से असहमत नहीं हैं. आखिर जिस देश में मुसलमान विशेषाधिकारों से पुरस्कृत है. जिसे देश का कानून या राष्ट्रीय कर्तव्य पालन न करने की स्वतन्त्रता है उसका उत्पीड़न कहाँ हो रहा है , हाँ इतना अवश्य है कि समाज के सभी क्षेत्रों पर दबाव बनाकर वह अपने इस्लामी एजेण्डे को गतिशील और प्रभावी बनाता जा रहा है. इसका नवीनतम उदाहरण तसलीमा नसरीन का वह वक्तव्य है जो उन्होंने केरल में एक पुस्तक विमोचन के अवसर पर दिया है और इस्लाम की वास्तविकता से समाज को परिचित कराया है.आज आवश्यकता इसी बात की है कि तुलनात्मक धर्मों के अध्ययन की परम्परा विकसित होनी चाहिये इस्लाम के उद्देश्य और उसकी कलाबाजियों से हम परिचित हो सकें.

आम मुसलमान

 इस्लामी आतंकवाद के इस युग में आम मुसलमानों की स्थिति का अध्ययन अपने आप में एक रोचक विषय है. काफी दिनों से मेरी यह इच्छा थी कि भारत के सामान्य मुसलमानों की इस समस्या पर राय जानने का अवसर मिले. कल मेरी यह इच्छा स्वत: पूर्ण हो गई जब मेरे घर में इन दिनों लकड़ी का काम रहे एक बढ़ई ने स्वयं इस बिषय पर चर्चा आरम्भ कर दी.  प्यारे मियाँ नाम का यह बढ़ई मुसलमान है और मेरे बारे में इतना जानता है कि मैं कुछ लिखने-पढ़ने का काम करता हूँ. कल काम करते-करते उसने टेलीविजन पर समाचार सुना कि भारत में आने वाले दिनों में कुछ आतंकवादी हमले हो सकते हैं. इस समाचार के बाद उसने बातचीत आरम्भ की.  उसकी बातचीत में दो-तीन बातें मोटे तौर पर निकल कर सामने आईं. उसका कहना था कि ये उग्रवादी अत्यन्त सुविधा सम्पन्न और शातिर हैं और पुलिस इन तक तो पहुँच नहीं पाती बेगुनाह मुसलमानों को अपना निशाना बनाती है. इस सम्बन्ध में उसने लाल किले पर हुये आतंकवादी हमले का उदाहरण देते हुये कहा कि इसके असली आरोपियों को तो काफी बाद में पकड़ा गया उससे पहले पुलिस ने रमजान महीने में एक निर्दोष मुसलमान को इन काउन्टर में आतंकवादी बताकर मार गिराया.    इसके बाद प्यारे मियाँ ने मुसलमानों को सन्देह की दृष्टि से देखे जाने का मुद्दा उठाया. उनका कहना था कि आज हर दाढ़ी वाले पर शक किया जा रहा है.   अन्त में प्यारे मियाँ ने मुझसे ही पूछा आखिर आतंकवादी ये हमले क्यों कर रहे हैं. मेरा उत्तर था कि इन आतंकवादियों की भाषा में वे इस्लाम की लड़ाई लड़ रहे हैं और मुसलमानों पर दुनिया भर में हो रहे अत्याचार का बदला ले रहे हैं. इस पर उस एक सामान्य मुसलमान का जिसने अपने धर्म के पालन में लड़कियों को पढ़ाया नहीं और जो दिन भर मजदूरी कर अपना पेट पालता है जो उत्तर था वह चौंकाने वाला था. इस उत्तर पर उन लोंगो को विशेष ध्यान देना चाहिये जो मानते हैं कि आम मुसलमान इस अन्तरराष्ट्रीय मुस्लिम राजनीति से नहीं जुड़ा है. प्यारे मियाँ ने कहा कि जिस तरह ईराक और लेबनान में इजरायल और अमेरिका निर्दोष मुसलमानों को रोज मार रहे हैं उससे तो आतंकवादी ही पैदा होंगे. आखिर दुनिया ऐसे काम क्यों नहीं रूकवाती जिस दिन ये रूक गया आतंकवाद भी रूक जायेगा.     प्यारे मियाँ की इस पूरी बातचीत से मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि दुनिया भर के मुसलमानों की सोच एक है और उनके जनमत निर्माता और उनकी जागरूकता के केन्द्र मौलवी और जुमा की सामूहिक नमाज उन्हें ऐसे तर्क सिखा रहे हैं कि वे इस्लामी आतंकवाद को न्यायसंगत ठहरा सकें. इसके अतिरिक्त समस्त दुनिया के मुसलमानों के मध्य उन पर अत्याचार का झूठा और मनगढ़न्त प्रचार किया जा रहा है.   अब भी समय है यदि सामान्य मुसलमानों को इस इस्लामी आतंकवाद के वैश्विक आन्दोलन से परे रखना है तो इनके मस्तिष्क को अपने अनुसार दिशा देने वाली मुस्लिम प्रचार मशीन पर कड़ी निगाह रखनी होगी और मस्जिदों और उसमें होने वाली तकरीरों पर भी ध्यान देना होगा. अन्यथा भारत की मुस्लिम जनसंख्या को आतंकवाद के विरूद्ध युद्ध में हम साथ नहीं ला पायेंगे और न चाहते हुये भी यह धर्म युद्ध का स्वरूप ग्रहण कर लेगा.

आतंक के शिक्षा केन्द्र

August 19, 2006 · Filed Under आतंकवाद · 1 Comment 

अभी इस वर्ष के आरम्भ तक भारत में चल रहे इस्लामी आतंकवाद को उसके वैश्विक और विचारधारागत स्वभाव से जोड़कर देखने पर देश के नेताओं, लेखकों, समीक्षकों और रणनीतिकारों को गहरी आपत्ति थी. यहाँ तक कि भारत के मुसलमानों को इस आतंकी नेटवर्क या विचार से परे सिद्ध करने के लिये तर्क दिये जाते थे कि भारत का कोई भी मुसलमान अफगानिस्तान और ईराक में तालिबान या अल-कायदा की ओर से लड़ने नहीं गया. परन्तु सम्भवत: ये समीक्षक भारत में स्थित उन इस्लामी संस्थानों को लेकर चिन्तित नहीं थे जो इस धरती से पूरे विश्व के मुसलमानों को कट्टरता और आतंक की शिक्षा दे रहे हैं.     जी हाँ ये चौंकने का विषय नहीं है भारत की धरती पर स्थित दो इस्लामी संस्थान समस्त विश्व में विध्वंस की मानसिकता रखने वाले आतंकियों के प्रेरणास्रोत हैं. लन्दन में अनेक विमानों को उड़ाने के षड़यन्त्र की पूछताछ में ब्रिटेन की पुलिस को पता चला है कि इस षड़यन्त्र में सम्मिलित कुल 23 लोगों में अनेक तबलीगी जमात के कट्टर समर्थक हैं. इस संगठन का ब्रिटेन की अधिकांश मस्जिदों पर नियन्त्रण है.        तबलीगी जमात की स्थापना 1927 में भारत में मोहम्मद इलयास नामक मुस्लिम द्वारा की गयी थी जिसका मुख्यालय दिल्ली के निजामुद्दीन क्षेत्र में है. इस संगठन की स्थापना इस्लाम में धर्मान्तरित हिन्दुओं को कट्टर मुसलमान बनाने के लिये गयी थी. इस संगठन के अनुयायियों को दाढ़ी बढ़ानी पड़ती है, पाँचो वक्त नमाज पढ़नी होती है तथा ये बड़ा कुर्ता और छोटा पायजामा पहनते हैं.     लन्दन षड़यन्त्र के एक संदिग्ध असाद सरवर के भाई अमजद ने ब्रिटेन के एक टी.वी चैनल को बताया कि उसके भाई ने विश्वविद्यालय की पढ़ाई छोड़ दी और तबलीगी जमात की साप्ताहिक बैठकों में जाने लगा. केवल असद ही नहीं अनेक संदिग्धों के रिश्तेदारों ने इनके तबलीगी जमात से जुड़ाव की पुष्टि की है. यह पहला अवसर नहीं है जब आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने वालों का जमात से लगाव और सम्पर्क रहा है. इससे पूर्व  जुलाई 2005 में हुये लन्दन विस्फोटों के दो फिदाईन सिद्दीक अहमद खान और शहजाद तनवीर ने तबलीग के नियन्त्रण वाली मस्जिद का दौरा किया था. इसके साथ ही अल-कायदा के अनेक सदस्यों ने अमेरिका के समक्ष स्वीकार किया कि उन्होंने पाकिस्तान में तबलीग के शिविरों में भाग लिया था. इसके अतिरिक्त गोधरा में अयोध्या से वापस लौट रहे कारसेवकों को साबरमती में जीवित जलाने की घटना में भी जाँच में तबलीगी जमात का नाम आया था.            इसके अतिरिक्त भारत का दूसरा इस्लामी संस्थान जो आतंक का शिक्षा केन्द्र है वह है दारूल उलूम देवबन्द. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से 70 कि.मी की दूरी पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में देवबन्द नामक स्थान पर स्थित यह मदरसा विश्व के बड़े इस्लामी आतंकवादियों की विचारधारा का पोषक रहा है. तालिबान अमीर मुल्ला उमर, जैश-ए-मोहम्मद का संस्थापक मसूद अजहर, पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ इसी देवबन्दी विचारधारा के अनुयायी हैं. जिहाद का अनुपालन करने वाली दो शाखाओं बरेलवी और देवबन्दी में मूलभूत अन्तर जिहाद के प्रकार को लेकर है. बरेलवी शाखा धीरे चलने में विश्वास करते हैं जबकि देवबन्दी ओसामा के जिहाद में भरोसा रखते हैं. समस्त विश्व में आज  जिहाद के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाले सभी संगठनों में अधिकांश की प्रेरणास्रोत देवबन्दी विचारधारा है.     इस स्थिति को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि 21वीं शताब्दी में इस्लामी आतंकवाद का प्रेरणा स्थल भारत हो जायेगा जैसा कभी 20वीं शताब्दी में सउदी अरब और उसका वहाबी चिन्तन था.     अच्छा होता हमारे देश के रणनीतिकार
स वास्तविकता को समझकर भारत को आतंकी शिक्षाकेन्द्र बनने से रोकते न कि इस मुगालते में जीते कि भारत किसी भी प्रकार से वैश्विक जिहाद का अंग नहीं है.

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