बिहार जनादेश के निहितार्थ

बिहार में बहुप्रतीक्षित विधानसभा चुनाव सम्पन्न हो गये और अब उस पर विश्लेषणों का दौर चल रहा है। इन चुनावों में जिस प्रकार असाधारण जनादेश आया है उसके बाद इन बारीकियों का विश्लेषण करने का कोई अर्थ नहीं है कि किस जाति या बिरादरी ने किसे कितना मत दिया या फिर किस मजह्ब ने किसे मत दिया और किसे नहीं। जिस अनुपात में जनादेश आया है उसने इन विश्लेषणों को मह्त्वहीन कर दिया है अब केवल चर्चा इस बात पर हो सकती है कि बिहार के जनादेश के निहितार्थ क्या हैं और राष्ट्रीय राजनीति के लिये इसमें क्या सन्देश छुपा है। Read more

देश की सेक्युलर राजनीति के पुनर्मूल्याँकन का समय ?

पिछले वर्ष देश में हुए आम चुनावों के बाद से सामान्य तौर पर एक नारा देश की सेक्युलर शक्तियाँ लगा रही हैं कि अब भारत बदल गया है और लोग विकास चाहते हैं और पहचान और साम्प्रदायिक राजनीति से तंग आ चुके हैं। यह बाद कहते समय जो बात इन तत्वों के ध्यान में रहती है वह यह कि अब विश्व में वैश्वीकरण का युग है और विश्व में एक क्षेत्र को दूसरे से पूरी तरह अलग थलग नहीं रखा जा सकता। ऐसे में एक प्रश्न सहज रूप से उठता है कि जो कुछ रुझान समस्त विश्व मे हमें देखने को मिल रहा है उस पृष्ठभूमि में ही यदि भारत की राजनीति को समझने का प्रयास किया जाये तो कुछ गम्भीर प्रश्न हमारे सम्मुख हमारे उपस्थित होते हैं जिनका उत्तर हमें देना ही होगा। इन प्रश्नों में से एक प्रश्न है कि सेक्युलर परिभाषा और राजनीति का स्वरूप क्या होना चाहिये? इसे एक विडम्बना ही कह सकते हैं कि पिछले कुछ वर्षों से जिस प्रकार यूपीए सरकार ने अपने प्रथम कार्यकाल में और फिर अपने दूसरे कार्यकाल में अभी तक पूरी तरह पश्चिम की शक्तियों के प्रभाव में अपनी अर्थव्यवस्था, विदेश नीति को क्रियांवित करने का प्रयास किया है ठीक उसके विपरीत आतंकवाद और इस्लाम व मुस्लिम जनता के साथ सम्बन्धों को परिभाषित करने में इस माड्ल को अपनाने का कोई प्रयास नहीं हुआ है। Read more

हिन्दू आतंकवाद के मिथक का पर्दाफाश

बी शांतनु
हिन्दी अनुवाद- अमिताभ त्रिपाठी
http://satyameva-jayate.org/2010/07/19/myth-of-hindutva-terror/

आज कल एक नया भूत सामने लाया गया है और वह है हिन्दुत्व आतंकवाद ( उर्फ हिन्दू आतंकवाद)। सम्भव है यह शब्द आपने पहले भी सुना हो , सम्भव है कि आपको इस पर क्रोध आया हो लेकिन आप क्रोधित होकर अपने कार्य में लग गये होंगे। सम्भव है कि आपने यह सोचने का प्रयास भी नहीं किया होगा कि यह हिन्दुत्व आतंकवाद है क्या? अभी कुछ दिन पूर्व मैं कुछ लोगों के मध्य था और जब उन्होंने यह शब्द सुना तो वे क्रुद्ध हो गये शायद इससे भी अधिक क्रुद्ध हों लेकिन वे अपने कार्य में लग जायेंगे।
अभी पिछले सप्ताह एक जागरूक पाठक ने आउटलुक की हिन्दू आतंकवाद सम्बन्धी आवरण कथा की ओर मेरा ध्यान दिलाया। इस कहानी को लेकर अपनी जल्दबाजी की संक्षिप्त प्रतिक्रिया में मैने लिखा, “ इस लेख को भयंकर ढंग से हिन्दू आतंक का शीर्षक दिया गया है परंतु यह नहीं बताया गया है कि यह हिन्दू सिद्धांतों और हिन्दू परम्पराओ से किस प्रकार प्रेरित है। इसी प्रकार कुछ स्थानों पर हिन्दुत्व का भी सन्दर्भ लिया गया है परंतु इसके प्रयास नहीं हुए हैं कि हिन्दुत्व से उनका आशय क्या है और लेखक के अनुसार इसका अर्थ क्या है? “ लेकिन इसके उपरांत मैंने इस कहानी को फिर से पढा और मुझे पता लगा कि इसे बिकाऊ बनाने के लिये सनसनीखेज बनाया गया है। लेकिन इस लेख में इसके तथ्यों पर चर्चा की जायेगी।

यदि हम आउटलुक की कहानी पर लौटें हालाँकि न तो इस विषय पर यह पहली कथा है और न ही अंतिम होगी लेकिन इस कथा की समाप्ति इस कथन के साथ हुई कि जब सीबीआई सारे बिखरे हुए सूत्रों को एकसाथ जोडेगी तभी हिन्दुत्व आतंकवाद का समग्र चित्र सामने आ सकेगा। 2000 शब्दों के इस लेख को स्मृति कोप्पिकर, देबर्षि दासगुप्त और स्निग्धा हसन ने सहयोग दिया है “ हिन्दू आतंकवाद एक वास्तविकता है फिर भी भारत इस वास्तविकता को नाम नहीं देना चाहता”।

यह कथा मई में प्रवीन स्वामी के आउटलुक के ही लेख “ The Rise of Hindutva Terror” | पहले लेख की समीक्षा करना अधिक उचित होगा। प्रवीन स्वामी की यह रिपोर्ट आन्ध्र प्रदेश में हैदराबाद मे मक्का मस्जिद पर आक्रमण के सिलसिले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक देवेन्द्र गुप्ता को उनके राजनीतिक सहयोगियों विष्णु प्रसाद और चन्द्रशेखर पाटीदार के साथ इस आक्रमण के लिये योजना बनाने के सन्देह में पकड्ने पर आधारित थी। Read more

हिन्दू जीवन पद्दति नहीं धर्म है

इन दिनों धर्म पर बहस काफी तीव्र हो गयी है और भारत में पिछले 6 दशक में कम्युनिज्म और सेक्युलरिज्म के घालमेल ने बौद्धिक वर्ग में धर्म के विषय को लेकर एक विशेष प्रकार की ग्रंथि का निर्माण कर दिया है जिसके चलते वह धर्म को बहस के दायरे से बाहर रखना चाहता है। ऐसा विशेष रूप से हिन्दुओं में पाया जाता है। राजनीति पर तो काफी खुलकर चर्चा होगी लेकिन जब धर्म की बारी आयेगी तो उस पर कोई भी चर्चा करने से परहेज करते हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि हिन्दू धर्म के शिक्षण और प्रशिक्षण की सार्वजनिक प्रक्रिया पूरी तरह ठप सी हो गयी है। अब नयी पीढी के हिन्दू अपनी धार्मिक पहचान के प्रति आग्रह तो रखते हैं लेकिन अपने धर्म के मूलभूत स्वरूप को लेकर भ्रमित रहते हैं।

इसके पीछे एक प्रमुख कारण यह है कि पिछले दो दशक में हिन्दूवादी संगठनों सहित अनेक मंचों से इस तथ्य को रूढ कर दिया गया है कि हिन्दू धर्म नहीं वरन जीवन दर्शन है। आज कोई भी बौद्धिक हिन्दू आपके मुँह से हिन्दू धर्म की बात निकलने से पहले ही उसे लपक कर कहता है कि हिन्दू धर्म नहीं वरन जीवन दर्शन है। यह भ्रम आखिर क्यों आया?

आज से कोई सौ वर्ष से पूर्व भी जब स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका और यूरोप में हिन्दू धर्म के बारे में अपने व्याख्यान दिये थे तो उन्होंने स्पष्ट रूप से हिन्दू धर्म को विश्व के सभी धर्मों के साथ तुलनात्मक दृष्टि से एक ऐसा धर्म सिद्ध किया था जिसमें आगे चलकर एक सार्वभौमिक धर्म बनने के गुण विद्यमान हैं। फिर स्वतंत्रता के बाद स्थिति बदल क्यों गयी? इसका कारण यही है कि हिन्दू धर्म को राजनीति और संविधान के दायरे में लाने के लिये उसकी नयी परिभाषा गढी जाने लगी और फिर सर्वोच्च न्यायालय का हिन्दुत्व के पक्ष में निर्णय आने के उपरांत इसे संवैधानिक पुष्टि मिल जाने के बाद तोता रटंत आरम्भ हो गया कि हिन्दुत्व जीवन पद्दति है।

वास्तव में वैश्विक स्तर पर अनेक ऐसे परिवर्तन होते हैं जिनकी दस्तक काफी पहले से मिलने लगती है। यही कुछ आज के सन्दर्भ में भी सत्य है। आज जिस प्रकार समस्त विश्व में धार्मिक पहचान का आग्रह तेजी से बढ रहा है उसका आरम्भ 1990 के दशक से ही हो गया था। कम्युनिज्म ने अपनी नास्तिक विचारधारा के चलते सेक्युलरिज्म को एक क़ृत्रिम आभास के रूप में जीवित रखा था। लेकिन सोवियत संघ के पतन के बाद से देश और लोग संस्कृति और राष्ट्र राज्य की अवधारणा से अधिक अपनी धार्मिक पहचान को आगे कर चल रहे हैं।

पश्चिम के देशों ने और इस्लामी देशों ने कभी भी सेक्युलरिज्म के नाम पर अपनी धार्मिक पहचान से समझौता नहीं किया था। किसी भी ईसाई देश में आज तक गैर ईसाई राष्ट्राध्यक्ष नहीं बना और ऐसा ही इस्लामी देशों के साथ भी है फिर भी भारत में सेक्युलरिज्म के नाम पर उसकी हिन्दू पहचान से उसे वंचित रखा गया और इसी प्रतिक्रिया में 1990 में हिन्दू आन्दोलन खडा हुआ।

हिन्दू आन्दोलन को संवैधानिक दायरे में और सेक्युलरिज्म के दायरे में रखने के लिये हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म को पृथक बताया गया और इस घालमेल के परिणामस्वरूप सामान्य हिन्दू जनमानस ने हिन्दू धर्म को एक जीवन पद्धति के रूप में परिभाषित करना आरम्भ कर दिया।

जब धर्म को राजनीति के माध्यम से स्थापित करने का प्रयास किया जाता है तो इसी प्रकार की भ्रम की स्थिति का निर्माण होता है।
आज इस बात की आवश्यकता है कि हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व के सम्बन्ध में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट की जाये।

हिन्दू धर्म को जीवन पद्धति बताने का प्रयास इस कारण भी हुआ कि हिन्दू धर्म अन्य सेमेटिक धर्मों की भाँति एक पुस्तक, पैगम्बर पर आधारित नहीं है लेकिन जीवन पद्धति के दायरे में कुछ नियम आते हैं जिन्हें धर्म की पुस्तक या पैगम्बर द्वारा निर्धारित किया जाता है और उसका पालन सुनिश्चित करने के लिये एक संस्थागत ढाँचा तैयार किया जाता है। जैसा कि इस्लाम धर्म में हमें देखने को मिलता है। शरियत और सुन्नत की अवधारणा इसी को प्रकट करते हैं। प्रत्येक इस्लाम धर्मावलम्बी के लिये इस्लाम, शरियत और सुन्ना ( अर्थात पैगम्बर के जीवन का अनुपालन) के आधार पर दिनचर्या और जीवन सुनिश्चित करने के लिये मौलवी, फतवे आदि की व्यवस्था है। इसी प्रकार इस्लाम एक आध्यात्मिक और दार्शनिक अवधारणा से अधिक शरियत के आधार पर जीवन जीने को प्रमुखता देता है। वैसे इस्लाम में भी रोजा, नमाज, जकात और हज आध्यात्मिक उन्नति के लिये ही है लेकिन योग पद्धति के अनुपात में उसका परिणाम अधिक देर से आता है। इसी प्रकार अल्लाह को ब्रह्म के रूप में स्थापित न करके पैगम्बर पर अधिक ध्यान दिया गया है।

वास्तव में सबसे प्राचीन सेमेटिक धर्म यहूदी धर्म में भी यहूदी कानूनों और जीवन पद्धति पर ही अधिक जोर दिया गया था जिसका काफी कुछ अंश इस्लाम में देखने को मिलता है। जैसे सुन्नत, एक ही दिशा में प्रार्थना ( इस्लाम में भी मक्का से पूर्व जेरुसलम की ओर मुँह करके ही प्रार्थना की जाती थी)। यहूदियों के सहस्रों वर्षों तक अपने मूल स्थान से दूर रहने के कारण उनके लिये मूल यहूदी जीवन पद्धति और कानूनों का पालन करना सम्भव नहीं हो सका और जिस देश में वे रहते थे उसी परिवेश के आधार पर उन्होंने स्वय़ं को ढाल लिया इसी कारण यहूदी आज अधिक विकसित और प्रगतिशील हैं। सम्भव है कि वे अपने ही देश में रहते तो उनका स्वरूप कुछ दूसरा होता।

हिन्दू धर्म के जीवन पद्धति के रूप मे परिभाषित करने से हिन्दू के लिये एक समान कानूनी संहिता, रहन सहन, पहनावा, खान-पान और आचार व्यवहार की आवश्यकता होती है। वास्तव में पिछले सहस्रों वर्षों से विश्व में धर्म पर चर्चा होते समय सेमेटिक धर्मों के प्रकाश में अन्य धर्मों के गुणों को परखा जाता है। इस आधार पर एकरूपता को धर्म की पहली शर्त माना जाता है। इसी बहस का परिणाम है कि कुछ धारणायें पूरी तरह उलट गयी हैं। जो धर्म जीवन पद्धति है उसे सर्वश्रेष्ठ धर्म के रूप में आँका जाता है और जिस धर्म में सार्वभौमिक धर्म होने की क्षमता है उसे जीवन पद्धति कहा जाता है।
आज के वैश्वीकरण और वैज्ञानिक युग में इस बात पर टकराव करने का कोई कारण नहीं है कि किसके पैगम्बर या अवतार श्रेष्ठ हैं और किसके कमतर हैं। इस युग में बहस इस बात पर होनी चाहिये कि धर्म के लक्षण क्या हैं और धार्मिक आधार पर टकराव समाप्त करने के लिये किसी सार्वभौमिक धर्म की कल्पना की जा सकती है क्या? लेकिन यदि कोई इसके उत्तर में कहे कि हमारा धर्म ही सार्वभौमिक है क्योंकि हमारे पैगम्बर को ही अंतिम मानो तब तो टकराव ज्यों का त्यों बना रहेगा। इसी प्रकार कोई कहे कि सबके चर्च की शरण में आये बिना सार्वभौमिक धर्म की अवधारणा सफल नहीं हो सकती तो भी टकराव समाप्त नहीं होगा। सार्वभौमिक धर्म वही हो सकता है जो व्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करे और उस पर नियम, कायदे, उपासना पद्धति या फिर किसी पैगम्बर का बोझ न डाले।

निश्चित रूप से अभी वह समय नहीं आया है लेकिन वह समय भी अधिक दूर नहीं है। हिन्दू धर्म को लेकर जो दुविधा सदैव से बुद्धिजीवियो में रही है वह दो स्तरों पर है। प्रथम, यदि हिन्दू धर्म की दार्शनिक अवधारणा और उसके औपनिषदिक चिंतन के आधार पर उसकी व्याख्या करें तो उसके लिये एक भौगोलिक ईकाई के आधार पर हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को पुष्ट कर पाना कठिन हो जाता है। क्योंकि हिन्दू धर्म का मूल स्वरूप आत्मा की अमरता, कर्मफल का सिद्धांत और सृष्टि के बहुत्व में एकत्व की ब्रह्म की अवधारणा है जो योग की अनेक शाखाओं के माध्यम से आत्मतत्व की प्राप्ति का क्रियात्मक पक्ष प्रस्तुत करता है। इस पूरी धारणा में किसी राष्ट्र, जाति, नस्ल या धर्म की सीमायें नहीं हैं और यह आधात्यामिक विज्ञान किसी के लिये भी खुला है लेकिन इस पूरी अवधारणा में भी राष्ट्रवाद के लिये स्थान है क्योंकि भारत में हिन्दुओं के पूर्वजों ने अध्यात्म विज्ञान की खोज की है जो सबसे बडा विज्ञान है कि सृष्टि में जो कुछ भी बहुलता दिखाई देती है उसके बाद भी एक ही तत्व उसकी एकता का आधार है जो सभी से जुडा है। इसी कारण व्यष्टि और समष्टि में समंवय का सिद्धांत हिन्दू धर्म का आधार है जिसका वर्तमान प्रकटीकरण हिन्दुत्व में होता है। अध्यात्म विज्ञान का पेटेंट हिन्दुओं का है इसलिये इसकी रक्षा करने का दायित्व भी उन्हीं का है।

स्वामी विवेकानन्द ने पहली बार किसी भी धर्म की आलोचना या किसी भी पैगम्बर की बहस में पडे बिना धर्म की एक सार्वभौमिक व्याख्या करने का प्रयास किया था। उन्होंने धर्म को पुस्तक और पैगम्बर की बहस के दायरे से बाहर लाकर कुछ मूलभूत सिद्धांतों की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया था। वर्तमान वैज्ञानिक युग में और वैश्वीकरण के इस युग में जब सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्तर पर सार्वभौमिकता का सिद्धांत स्थापित हो रहा है तो धार्मिक स्तर पर भी सार्वभौमिकता का सिद्धांत स्थापित होना ही चाहिये।

आज जिस तीव्रता से पश्चिम में और अफ्रीकी देशों में हिन्दू धर्म को स्वीकार किया जा रहा है उसका मूलकारण उसकी सार्वभौमिकता और व्यापकता है। हिन्दू धर्म किसी एक अवतार या पुस्तक पर आधारित नहीं है। इसके कुछ मूलभूत सिद्धांत हैं जिसमें आत्मा की अमरता और ब्रह्म की व्यापकता है। इस सिद्धांत को सर्वस्वीकार्य बनाने के लिये और उसका सातत्य बनाये रखने के लिये जितनी दार्शनिक और बौद्धिक कसरत भारत में हमारे पूर्वजों ने की है उतनी अन्यत्र कहीं नहीं हुई है। वेदों से लेकर उपनिषदों तक दार्शनिक, पौराणिक और कर्मकाण्ड के स्तर पर एक ही सिद्धांत को प्रतिपादित करने का प्रयास हुआ। पुराणों की कथायें, कर्मकाण्ड ये भी उसी परम सत्ता के प्रति व्यक्ति को उन्मुख करते हैं। भारत में यदि कोई किसी देवता की आराधना करता है, पत्थर की उपासना करता है या फिर साँप की भी पूजा करता है तो वास्तव में उसमें विद्यमान उस ब्रह्म की आराधना करता है। विज्ञान भी तो सभी तत्वों को संचालित करने वाली शक्ति के अंवेषण में ही लगा है। विज्ञान के सभी आविष्कार एक ही दिशा की ओर संकेत करते हैं कि इस सृष्टि में बहुत्व में एकत्व है। लेकिन इस एकत्व को अनुभव करने का विज्ञान हिन्दू धर्म ने वर्षों पूर्व ही खोज निकाला था।

हिन्दू धर्म को जीवन पद्धति सिद्ध करने का कारण केवल यही रहा है कि हिन्दू धर्म ने अपने मूलभूत सिद्धांतों को धर्म की परिभाषा का आधार बनाने का प्रयास ही नहीं किया। आयुर्वेद, अष्टाँग योग, गंगा, गायत्री, गोमाता, चारों धाम ये भारत की संस्कृति के नहीं हिन्दू धर्म की एकता के आधार हैं। आयुर्वेद, अष्टाँग योग व्यक्ति की वह आरम्भिक तैयारी है जब वह स्वयं को आत्मतत्व और ब्रह्म से साक्षात्कार के लिये तैयार करता है। इसी प्रकार चारों धाम, गंगा और गोमाता एक सामान्य हिन्दू को अपने बुद्धि विवेक के आधार पर हिन्दू धर्म के मूल सिद्धांतों और ब्रह्म से जुडाव का आभास देते हैं। चारों धाम की यात्रा हिन्दू देश की सांस्कृतिक एकता का दर्शन करने के लिये नहीं करता वरन अपना परलोक सुधारने के लिये करता है। इसी प्रकार गंगा का दर्शन करने लोग इस भाव से नहीं जाते कि वे सांस्कृतिक दृष्टि से भावविभोर हो जायें वरन इस भाव से जाते हैं कि गंगा स्वयं शिव की जटा से निकली हैं और इसमें स्नान करने से उनके पापों का मोचन होगा। भारत में सांस्कृतिक विविधता में भी एकता का भाव उसकी बहुत्व में एकत्व की आध्यात्मिक अवधारणा के कारण है और यही कारण है कि राम मन्दिर आन्दोलन में राम उसी ब्रह्म की एकता के प्रतीकरूप थे। राममन्दिर आन्दोलन में लोगों ने भाग विशुद्ध आध्यात्मिक भाव से लिया था।

अब अवसर आ गया है कि हिन्दुत्व को लेकर चल रही बहस पर कुछ ठहर कर विचार किया जाये और बिना सोचे समझे इसे जीवन पद्धति कहते रहने के स्थान पर तुलनात्मक धर्म का विमर्श आरम्भ किया जाये और धर्म के मूलभूत तत्वों के सन्दर्भ में सभी धर्मों की व्याख्या की जाये और जीवन पद्धति और धर्म का अंतर स्पष्ट किया जाये। इतने वर्षों में धर्म के आध्यात्मिक स्वरूप की अवहेलना करते रहने से धर्म का बाह्य स्वरूप ही धर्म का प्रतीक बनता जा रहा है और सारा झगडा बाह्य स्वरूप पर हो रहा है। धर्म के आधार पर खान-पान, रहन-सहन, आचार-व्यवहार को स्थापित करने के प्रयास के कारण विवाद पनपते हैं। भारत में हिन्दुओं में सांस्कृतिक आधार पर विविधता होते हुए भी आपस में एकता का आधार आध्यात्मिक संचेतना का मूलबिन्दु का एक होना है और सभी सांस्कृतिक विविधतायें इसी मूलबिन्दु पर केन्द्रित हैं। जबकि इसके विपरीत अन्य धर्मों का केन्द्रबिन्दु आध्यात्मिक न होने से मूल समस्या है और विषय यह उठाया जाता है कि इतनी सांस्कृतिक विविधताओं के लोग भारत में एक साथ रहते हैं तो फिर कुछ धर्मों के साथ क्या समस्या है? समस्या यही है कि एक तो उनका धार्मिक केन्र्् हिन्दू धार्मिक केन्द्र के साथ मेल नहीं खाता और वे अपनी धार्मिक श्रेष्ठता को भारत पर थोपने का प्रयास करते हैं।

वर्तमान वैश्वीकरण और वैज्ञानिक युग में वही विचारधारा या धर्म लोगों को संतुष्ट कर सकता है जो बहुत्व में एकत्व की बात करे और मानव मात्र को समभाव से देखे। हिन्दू धर्म ने जिस आध्यात्मिक विज्ञान की सर्जना की है वह देश काल परिस्थिति से परे सतत विकासमान धारा है जो शरीर, मन, बुद्धि से परे आत्मा के प्रदेश में ले जाती है और प्रकृति से भी स्वतंत्र कर पूर्ण मुक्ति प्रदान करती है।

इसी सिद्धांत के आधार पर विश्व को आगे बढना उसकी नीयति है। वैसे भी विश्व इतिहास पर यदि दृष्टि डालें तो हम पाते हैं कि जिहाद और क्रुसेड के काल के बाद से व्यक्ति दिनोंदिन स्वतंत्रता की ओर ही बढ रहा है। प्रबोधन युग में यूरोप ने चर्च की जडता को तोडा, फिर व्यक्ति की महत्ता को स्थापित किया गया, फ्राँसीसी क्रांति से पहले रूसो जैसे विद्वानों ने व्यक्ति की इच्छा का सिद्धांत स्थापित कर कहीं न कहीं व्यक्ति के भीतर विद्यमान स्वतंत्र सत्ता को ट्टोलने का प्रयास किया और फिर राजनीतिक संस्थाओं के द्वारा भी व्यक्ति को सार्वभौम सत्ता के रूप में स्थापित किया गया और आधुनिक युग में लोकतंत्र की सैद्धांतिक अवधारणा यही है कि व्यक्ति की इच्छा का सम्मान होना चाहिये। यह बात अलग है कि व्यावहारिक रूप से इसका प्रयोग अपने सिद्धांत के अनुरूप खरा उतरा या नहीं।

औपनिवेशिक काल का नस्ली श्रेष्ठता का विचार भी स्थायी नहीं रहा और फिर भौतिक द्वन्द्व का कम्युनिष्ट सिद्धांत भी अल्पकालिक सिद्ध हुआ। अब वैश्वीकरण का सिद्धांत स्थापित हो रहा है। अनेक पूर्वाग्रहों के चलते इस संक्रमण काल को अनेक रूपॉं में परिभाषित किया जा रहा है लेकिन वैश्वीकरण की यह संस्कृति शनैःशनैः सार्वभौमिकता के सिद्धांत को प्रबल कर रही है। अब राष्टृ राज्य और सरकारों की संस्कृति ढीली पड रही है और बहुराष्ट्रीय संस्कृति पनप रही है जहाँ व्यक्ति नस्ल, जाति, देश और सिद्धांतों की सीमाओं से परे व्यक्तिगत सम्बन्धों को मह्त्व दे रहा है। आज विश्व में अनेक स्थानों पर ऐसे निजी और व्यक्तिगत प्रयास सामने आ रहे हैं जिन्होने किसी भी राज्यगत संस्था से अधिक प्रभाव अर्जित किया है। शनैः शनैः विश्व एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है जहाँ आने वाले वर्षों में अनेक प्रचलित अवधारणायें ध्वस्त होंगी और व्यक्ति अधिक स्वतंत्रता की ओर उन्मुख होगा और ऐसी स्थिति में शायद धर्म भी उसे सीमित नहीं कर सकेगा यदि उसकी सार्वभौमिक पहुँच नहीं है।

राजनीति का अजीर्ण

जब से देश में लोकसभा चुनावों का परिणाम आया है सर्वत्र एक ही चर्चा होती आ रही है और वह है राजनीति की। देश का प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी प्रकार से राजनीति को लेकर ही चिंतित है। किसी की चिंता है कि अब भाजपा का क्या होगा तो किसी की चिंता है कि अब देश में विपक्ष की राजनीति का क्या होगा? बीते तीन माह में अभी तक मुझे एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो देश की सुरक्षा, देश के विकास या इसकी संस्कृति से जुडे विषयों पर चर्चा करने का इच्छुक हो कोई भी बात आरम्भ होती है तो ले देकर भाजपा के भविष्य पर टिक जाती है। कभी कभी तो मुझे आश्चर्य होता है कि जिस राजनीतिक दल के लिये लोग इतने चिंतित हैं आखिर वह चुनावों में पराजित कैसे हो गया? खैर यह तो और बात है लेकिन मेरी चिंता इस बात को लेकर है कि राजनीति पर समाज की इतनी निर्भरता आखिर क्या संकेत देती है? यह समाज के लिये सकारात्मक सन्देश है या नकारात्मक। मेरी अपनी दृष्टि में तो नकारात्मक है। चुनावों के समाप्त होने और नयी सरकार बनने के उपरांत पिछले तीन माह में मैने कुछ भी नहीं लिखा केवल भाजपा की पराजय के कारणों वाला एक लेख छोडकर। इसके पीछे प्रमुख कारण यही रहा कि मैं इस पूरी बहस के थमने की प्रतीक्षा कर रहा था और देखना चाहता था कि क्या राजनीतिक अतिरेक केवल क्षणिक है या फिर यह संस्कार बन चुका है?

इन तीन महीनों में देश के कुछ क्षेत्रों में भ्रमण के उपरांत मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि समाज पूरी तरह राजनीति परक और राज्य मुखापेक्षी हो चुका है। समाज में अब जागरूकता भी है लेकिन राजनीति के प्रति आकर्षण भी गजब का है। इसके पीछे दो कारण हैं। पहला, समाज के विकसित होने और जातिवाद और जमींदारी व्यवस्था के पूरी तरह ढीला पड जाने से समाज में विशेषाधिकार सम्पन्न होने की अभिलाषा राजनीति के द्वारा ही पूर्ण होती दिखती है। अब भी भारत में जनप्रतिनिधि सामान्य जनता से अधिक रूतबे वाला माना जाता है और लोग उसे नमस्कार करते हैं जैसे किसी जमाने में रियासत के राजा और जमींदार को करते थे। यही कारण है कि राजनीति के प्रति आकर्षण तेजी से बढ रहा है। दूसरा प्रमुख कारण पिछले कुछ दशक में राजनीति में धन की अपार सम्भावनाओं ने युवाओं को इसकी चमक दमक से ओत प्रोत कर दिया है। राजनीति में अपार भ्रष्टाचार से और सांसद, विधायक निधि से लेकर पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत स्थानीय निकायों को मिलने वाली विकास राशि ने ठेकों की एक नयी संस्कृति विकसित कर दी है जो राजनेता के इर्द गिर्द रहने से चुट्कियों में लखपति बना देती है। सांसदों, विधायकों और स्थानीय निकाय को मिलने वाले धन ने राजनीति को युवाओं के लिये एक नया व्यवसाय और प्रोफेशन का विकल्प दे दिया है यही कारण है कि पूरे देश में सर्वत्र एक ही चर्चा है और वह है राजनीति।

युवा से लेकर समाज सुधारक तक सभी यह मान बैठे हैं कि यदि अपना या समाज का कोई सुधार करना है तो राजनीति ही वह माध्यम है जिससे सफलता मिल सकती है। अब तो गाँव भी राजनीतिक दलों और विचारधाराओं में बँट गये हैं और ऐसा कि बात दुश्मनी तक आ जाती है।

राजनीति का यह ज्वार इस प्रकार उठा है कि अब प्रत्येक विचारधारा, सोच और आदर्श राजनीति के घटिया दाँव पेंच में उलझ कर रह गया है। समाज का स्वय़ं पर से विश्वास उठता जा रहा है और पूरा समाज प्रवाह पतित की भाँति एक ही दिशा में प्रवाहमान है। हर कोई सोच पाल बैठा है कि समाज का कोई भी सुधार राजनीति के रास्ते ही सम्भव है। इसका परिणाम यह हुआ है कि शब्दों ने अपने मायने बदल दिये हैं। अब बडे बडे आदर्शवादी शब्द केवल इसलिये बोले जाते हैं कि लोकतंत्र में जनता का हुजूम अपने पीछे लाकर अपनी राजनीतिक कीमत लगाई जा सके।

हालाँकि यह बात भी पूरी तरह सत्य है कि भारत का लोकतांत्रिक ढाँचा इस प्रकार का है कि कोई भी जनान्दोलन या जनअभिव्यक्ति की तार्किक परिणति राजनीति और सत्ता में ही होती है लेकिन समस्त समाज का इस प्रकार राजनीति के प्रति आकर्षण पाल लेना कहाँ तक उचित है यह अवश्य सोचनीय विषय है।

लोकसभा चुनावों के समाप्त होने के उपरांत भारत के समाज के समक्ष कुछ प्रश्न समय ने खडे किये हैं जिनका समाधान भारत को ही करना है और उनमें से एक प्रश्न है भारत अब किस राह चलेगा? इसका समाधान राजनीति में नहीं है। कोई भी राजनीतिक दल वर्तमान व्यवस्था में इसका समाधान नहीं कर सकता और जो भी व्यवस्था परिवर्तन की बात करता है वह समाज को गुमराह करता है क्योंकि जिस व्यवस्था के चलते समस्यायें आती हैं उन्हें बदलने का साहस किसी में नहीं है। क्योंकि अभी तक इस बात पर विचार ही नहीं हुआ कि कौन सी व्यवस्था भारत के लिये उपयुक्त है।

आज देश में जहाँ समाज के अधिकाँश लोग राजनीति के आकर्षण में लिप्त हैं तो वहीं समाज में परिवर्तन की आहट भी सुनायी पड रही है। लेकिन दुखद पक्ष यह है कि परिवर्तन के लिये प्रयासरत शक्तियाँ किसी न किसी विचारधारा को पकड कर चल रही हैं और उन अभी विचारधाराओं में सामयिक परिवर्तन की आवश्यकता है क्योंकि प्रत्येक विचारधारा का एक कालखण्ड होता है क्योंकि कोई भी दृष्टा अपने युग, देश काल परिस्थिति के अनुसार ही परिस्थितिजन्य समाधान समाज को देता है और समाज अर्थात व्यक्तियों का समूह सतत विकासमान रहता है इसलिये कोई कितना भी दृष्टा क्यों न हो एक समय के बाद उसके विचारों के कुछ तत्व निश्चय ही पुराने पड जाते हैं। यही कुछ भारत के सन्दर्भ में हो रहा है। आज भारत में राजनीति का कोई आदर्श और उद्देश्य नहीं रह गया है क्योंकि देश और समाज ने अपने लिये कोई लक्ष्य या उद्देश्य ही निर्धारित नहीं किया है। ऐसी अवस्था में व्यक्तिगत स्वार्थ, अर्थ साधना और भोगवाद चरम पर है।
आज विचार के स्तर पर भारत में जडता आ गयी है और हर विचारधारा सामयिक परिवर्तन के लिये कोई प्रयास ही नहीं कर रही है।

भारत के सभी विचारक और लेखक अपने युग का बोझ ढो रहे हैं। ये लोग अपने पूर्वाग्रहों और युग बोध से आगे नहीं बढ पा रहे हैं और समाज में आये परिवर्तन को भाँप पाने का साहस दिखाते नहीं दिखते।

आज वैश्विक स्तर पर और भारत के स्तर पर कुछ बडे परिवर्तन हो रहे हैं और उनमें से एक है कुछ परिकल्पनाओं का ढहना। इसी प्रकार की एक परिकल्पना है कम्युनिज्म जो पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुकी है। भारत की स्वतंत्रता के उपरांत जिन दो परिकल्पनाओं ने भारत के मूल हिन्दू जागरण को भ्रमित कर स्वतंत्रता को अपनी हिन्दू पहचान प्राप्त करने के व्यापक अभियान से राजनीतिक अभियान तक सीमित कर दिया था उसमें एक कम्युनिज्म और दूसरा सेक्युलरिज्म है। कम्युनिज्म की समतामूलक समाज की अवधारणा की छाया तले पल रहे समाजवादी आन्दोलनों ने भी दम तोड दिया और सभी समाजवादी परिवारवाद और पूँजीवाद के पैरोकार हो गये। कम्युनिज्म के क्षीण होने से अब धर्म की पहचान का आग्रह सतह पर आ गया है और इसी कारण सेक्युलरिज्म का कृत्रिम आभास भी ध्वस्त होते देर नहीं लगेगी।

वैसे तो सेक्युलरिज्म की परिकल्पना या अवधारणा अपने आप में एक बडा छलावा है। क्योंकि फ्रांसीसी क्रांति के बाद से जिस आधुनिक युरोप का विकास हम राजनीतिक धरातल पर होते हुआ पाते हैं उसके बाद भी युरोप ने कभी भी अपनी ईसाई पहचान के साथ समझौता नहीं किया है। नेपोलियन बोनापार्ट के विरुद्ध युरोप और रूस का एकजुट होने का आधार ही ईसाइयत को बचाना था। वास्तव में जो भी विश्व इतिहास लिखा गया वह वर्ग संघर्ष और भौतिक द्वन्द्व के पूर्वाग्रह से इस कदर प्रभावित रहा है कि युरोप के इतिहास में धर्म के तत्व को पूरी तरह नजरअन्दाज कर दिया गया है। यदि फ्रांसीसी क्रांति के बाद भी युरोप का इतिहास देखा जाये तो पश्चिम ने कभी भी अपनी ईसाई पहचान के साथ समझौता नहीं किया और आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था का चर्च के साथ टकराव इस बात पर रहा कि राज्य का नियंत्रण आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं के हाथ में रहे।

फ्रांसीसी क्रांति के बाद से कम्युनिज्म के क्रमशः विकास के चलते कम्युनिज्म और सेक्युलरिज्म का ऐसा घाल मेल हो गया कि उपनिवेशवाद के पश्चात स्वतंत्र हुए देशों ने सेक्युलरिज्म को अपने मूल धर्म के अवरोध के रूप में अपना लिया जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण भारत के समक्ष है जहाँ हिन्दू धर्म को विकास और राज्य व्यवस्था के लिये प्रतिगामी मान कर उसे हतोत्साहित करने का प्रयास किया गया जबकि वहीं इस्लाम और ईसाइयत को प्रोत्साहन दिया गया।

अब कम्युनिज्म के ध्वस्त होते ही धार्मिक पहचान को लेकर आग्रह बढता जा रहा है क्योंकि अब बौद्धिक वर्ग संशयवाद और नास्तिकता के दौर से बाहर आ चुका है और अपनी धार्मिक पहचान को लेकर मुखर होता जा रहा है।

विश्व में हो रहे इन परिवर्तनों के पीछे सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अब वैश्वीकरण एक स्थापित सत्य बनता जा रहा है जो अनेक आर्थिक और सांस्कृतिक सम्भावनाओं को जन्म देता है। वैश्वीकरण का यह विस्तार अब रुकने वाला नहीं है और बहुराष्ट्र्रीय कारपोरेट संस्कृति और सूचना के प्रवाह के चलते एक विशेष प्रकार के पदार्थवाद और वैज्ञानिकवाद का जन्म हो रहा है। एक ओर वैश्वीकरण के प्रभाव के चलते जहाँ पदार्थवाद और भोगवाद को प्रश्रय मिल रहा है वहीं वैज्ञानिक जिज्ञासा भी बढ रही है और इस कारण कोई भी विचार या मान्यता जो जिज्ञासु मन को शांत नहीं कर सकती अप्रासंगिक होती जायेगी। इस दौर में एक बार फिर सत्य , रहस्य और दार्शनिक विचारों की ओर आकर्षण बढने वाला है इसलिये इसी सन्दर्भ में नये विचारों की माँग समाज कर रहा है।
वैश्विक स्तर पर हो रहे इन परिवर्तनों की पृष्ठभूमि में भारत को अपनी आध्यात्मिक और सत्यांवेषण प्रधान विचारधारा के अनुरूप समाज और राजनीति का विकास करना होगा। जिस प्रकार आध्यात्मिक स्तर पर बहुत्व में एकत्व का सिद्धांत हमारे ऋषिय़ॉं ने खोज निकाला और सभी आध्यात्मिक धाराओं को एकजुट किया उसी आधार पर समाज और राजनीति को विकसित करने की आवश्यकता है।

इस युग में स्वतंत्रता को बाधित नहीं किया जा सकता। कोई भी राष्ट्र, व्यक्ति, धर्म या जाति किसी अन्य की स्वतंत्रता का अपहरण नहीं कर सकता। इस युग का सत्य है स्वतंत्रता और उसे उत्तरदायित्वपूर्ण बनाने की आवश्यकता है। स्वतंत्रता की इसी आकाँक्षा के चलते कोई भी एक विचारधारा पर स्थिर नहीं रहना चाहता और अपने स्तर से उपयोगी सत्य का आभास प्राप्त करना चाहता है। आज विचारकों , लेखकों और सृजनात्मक अभिरुचि के व्यक्तियों को अपना युगीन पूर्वाग्रह छोड्कर नये सन्दर्भ में चीजों को देखना चाहिये। इस युग का सत्य यही है कि धर्म और भोगवाद साथ साथ बढ रहे हैं जो वैज्ञानिकवाद को अधिक सशक्त कर रहे हैं जिसकी परिणति है स्वतंत्रता की आकाँक्षा। भारत में सदियों से आध्यात्मिक दृष्टि से स्वतंत्रता रही है अब उसे सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी लाना है।

भारत को दूसरी सबसे बडी आवश्यकता देश की युवा शक्ति को रोजगार के साथ जोडने की है ताकि वह अपनी न्यूनतम आवश्यकता की चिंता से मुक्त होकर राष्टृ और धर्म की रक्षा में सन्नद्ध हो सके। आज भारत को राजनीतिक दलों की नहीं सामाजिक संगठनों की आवश्यकता है जो पढे लिखे ऊर्जावान और राष्ट्रभक्त युवाओं को जो अगले एक दशक में भारत को महाशक्ति के रूप में देखना चाहते हैं उन्हें गाँवों में भेज सकें ताकि कृषि, उद्योग, तकनीकी शिक्षा का एक जाल तैयार किया जा सके और गाँव रोजगार का केन्द्र बन सकें और शहरों की ओर पलायन रुक सके।

आज राजनीति के द्वारा देश का विकास नहीं होगा और न ही व्यवस्था परिवर्तन का नारा लगा कर युवाओं को बरगलाने से ही कोई क्रांति होगी। व्यवस्था परिवर्तन का नारा देने वाले या रामराज्य का नारा देने वाले बेचारे स्वयं व्यवस्था की कमियों का शिकार हो जाते हैं और फिर उनके समर्थक स्वयं को ठगा हुआ सा अनुभव करते हैं। भारत को महाशक्ति बनाने का रास्ता भारत के गाँवों के विकास से जाता है न कि माल, फ्लाई ओवर या सेंसेक्स के रास्ते। आज देश के युवाओं को गाँवों की ओर लौटो का नारा देने की आवश्यकता है। जिस देश के युवा के हाथों को काम मिलेगा, सम्मानजनक जीवन , स्वस्थ वातावरण मिलेगा तभी वह देश के बारे में सोच सकेगा। महानगरों में नारकीय जीवन व्यतीत करने वाला, जीवन भर झुग्गी में रहने वाला और ठेके के लिये नेताओं की चाकरी करने वाला युवा देश को क्या महाशक्ति बनायेगा?

आज बदलते हुए इस परिवेश में राजनीति के अजीर्ण से बचकर समाज और राष्ट्र की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। युवा प्रधान भारत के युवाओं को सक्षम और सशक्त बनाने से ही भारत का सर्वांगीण विकास सम्भव है। आज भारत इतिहास के मुहाने पर खडा है जहाँ से भारत को अपनी दिशा तय करनी है। अपनी सहस्रों वर्ष पुरानी आध्यात्मिक विचारधारा की स्वतंत्र और सत्यांवेषी प्रवृत्ति को समाज और राजनीति में ढालने का अवसर आ गया है। हर राष्ट्र का कुछ मूल तत्व होता है और भारत का मूल तत्व आध्यात्मिकता है। आध्यात्मिकता ही वैश्वीकरण और वैज्ञानिक युग की जिज्ञासा का समाधान दे सकता है जो अंततः प्रकृति पर विजय और उससे मुक्त होने की राह दिखाकर स्वतंत्रता की चरम परिणति तक पहुँचाती है।