When politics leads and society follows?

For last two three days I have been watching the continuous coverage on the induction of few members in BJP who were sacked from the cabinet of BSP government headed by Ms Mayawati. It has become a bigger issue rather than any other in last few days. It would be unfair to be on neutral side on this whole affair which has almost drawn the attention of every one. Simultaneously one other development took place when the anti graft crusader for last one year Anna Hazare and his team seems to be in total disarray as long as their next strategy is concerned. Both of these developments put before us few questions which we need to answer. Read more

Who wins Uttar Pradesh?

Election commission of India has announced the dates for the five state assembly polls in next year but the election of Uttar Pradesh has got more attention as the elections in Uttar Pradesh are called the mother of elections. Elections commission has surprised everyone with its program but the atmosphere in Uttar Pradesh is getting hot with every passing day. It is quite difficult to predict the outcome of the results in next year but few trends have started to emerge. Read more

चुनाव परिणाम बनाम हिन्दुत्व

May 21, 2009 · Filed Under धर्म, हिन्दुत्व · Comment 

चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद से इस बात पर काफी चर्चा हो रही है कि अब देश में हिन्दुत्व आन्दोलन का क्या होगा? यह विषय इस समय उठाना इसलिये आवश्यक हुआ है कि जिस दिन चुनाव परिणाम घोषित हो रहे थे उस दिन मैं दिल्ली से कहीं जा रहा था और मेरे साथ विमान में कुछ मुस्लिम बन्धु भी बैठे थे वे लोग आपस में जिस प्रकार की चर्चा कर रहे थे उसके बाद मैं कुछ सोचने पर विवश हुआ कि क्या इस जनादेश को हिन्दुत्व के विरुद्ध सेक्युलर जनादेश माना जाये। ऐसा नहीं मानने के पीछे मेरे कुछ तर्क हैं। जिस सन्दर्भ में मुस्लिम और ईसाई समाज के लोग इस चुनाव परिणाम को सेक्युलर जनादेश मान रहे हैं वह सीधा-सीधा यह दर्शाता है कि हिन्दूवादी संगठनों की शक्ति कम हुई है और अब वे देश की राजनीति के केन्द्र में नहीं रह गये हैं। परंतु यह निष्कर्ष निकालने से पूर्व कुछ तथ्यों पर गौर करना आवश्यक होगा।
इस चुनाव में जनता ने किसी भी ऐसे प्रत्याशी को पराजित नहीं किया है जिसे इस चुनाव में हिन्दुत्व के मुद्दे के साथ जोडा गया था। जैसे वरुण गान्धी भारी बहुमत से जीतकर आये और गुजरात में भाजपा की सीटों में वृद्धि हुई। इसके विपरीत सेक्युलरिज्म के नाम पर अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की हदें पार कर हिन्दू विरोध को अपनी राजनीति का केन्द्र बनाने वाली शक्तियाँ पूरी तरह नकार दी गयीं। पिछले दो दशक से अल्पसंख्यकों के अलम्बरदार होने का दावा करने वाले और साम्प्रदायिक शक्तियों को देश से साफ करने के नाम पर एक मंच पर आने वाले लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और रामविलास पासवान पूरी तरह धूल चाट गये और यह परिवर्तन ऐतिहासिक परिवर्तन है। इसी प्रकार चुनाव के दौरान अल्पसंख्यकों की नयी हितैषी उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने जब लोकतंत्र की धज्जियाँ उडाते हुए अल्पसंख्यकवाद का नया अध्याय रचा और वरुण गान्धी पर रासुका जैसा कठोर कानून लगा दिया तो चारों ओर कहा जाने लगा कि अब मायावती की सीटें काफी बढ जायेंगी लेकिन अंत में क्या हुआ? यह तथ्य यह स्पष्ट करता है कि अब एकाँगी सेक्युलरिज्म देश में नहीं चलेगा।

वास्तव में पिछले दो दशक में देश में हिन्दुत्व आन्दोलन के बाद से देश में एक वातावरण में परिवर्तन आया है और अब सेक्युलरिज्म के नाम पर हिन्दूवादी संगठनों को गाली देना और बेशर्मी से मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बढावा देने की किसी भी प्रवृत्ति का विपरीत प्रभाव होता है। गुजरात में 2002 से कांग्रेस और देश के सेक्युलर लोग नरेन्द्र मोदी को भला बुरा कहते रहे और प्रत्येक चुनाव में गुजरात दंगों का विषय उठाते रहे लेकिन हर बार जनता ने मोदी को भारी बहुमत दिया क्योंकि अब सेक्युलरिज्म के नाम पर अल्पसंख्यकवाद का नग्न प्रदर्शन करते हुए उन हिन्दू मतदाताओं को अपने साथ नहीं लिया जा सकत जिनके बारे में माना जाता है कि वे उदारवादी हैं। इसी कारण भाजपा न केवल गुजरात में हर बार विजयी होती रही वरन कर्नाटक जैसे राज्य में भी वह अपने बूते पर सरकार बनाने में सफल रही क्योंकि जनता दल सेक्युलर जैसी अवसरवादी पार्टी ने राजनीतिक मान्यताओं को तार तार कर फिर से सेक्युलरिज्म का मुद्दा उठाया। इसी प्रकार लालू प्रसाद ने वरुण पर रोलर चलाने की बात की और मुस्लिम समाज को अपने साथ लाने का दाँव चला। लेकिन हिन्दू समाज इस बात को देख चुका था कि किस प्रकार इन्ही लालू प्रसाद ने केन्द्रीय मंत्री रहते हुए देश में हुए आतंकवादी आक्रमणों के बाद भी इस्लामी आतंकवादी संगठन सिमी की खुलेमाम पैरवी की थी। इसी प्रकार रामविलास पासवान ने केन्द्र सरकार में मंत्री रहते हुए भी बांग्लादेशी घुसपैठियों को देश की नागरिकता देने की माँग की थी। इस चुनाव में मुम्बई पर पिछले वर्ष हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाने वाले केन्द्रीय मंत्री ए.आर. अंतुले को भी महाराष्टृ की जनता ने पटखनी दी और संसद नहीं पहुँचने दिया। इसी प्रकार अनेक दशकों से बिहार की राजनीति में आतंक का पर्याय बने और अपने अपराध को अल्पसंख्यक की खोल में बचाने वाले सैयद शहाबुद्दीन की पत्नी को भी एक निर्दलीय प्रत्याशी के हाथों मुँह की खानी पडी। इस चुनाव के बारे में बिहार के मेरे एक पत्रकार मित्र ने चुनाव के मध्य ही बताया था कि शहाबुद्दीन के समर्थक नारा लगा रहे हैं कि हिना नहीं तो जीना नहीं( हिना शहाबुद्दीन की पत्नी हैं) और यही नारा उन्हें भारी पडेगा क्योंकि इस नारे के बाद चुनाव ध्रुवीकृत हो गया है और किसी बडे दल के प्रत्याशी न होने की स्थिति में लोग निर्दलीय प्रत्याशी को चुन रहे हैं। चुनाव परिणाम के बाद उस पत्रकार मित्र की बात सत्य सिद्ध हुई।

इस चुनाव परिणाम ने स्पष्ट कर दिया है पिछले दो दशक में हिन्दुत्व आन्दोलन ने देश में हिन्दुओं में अधिक चेतना पैदा की है और वे सेक्युलरिज्म के नाम पर अपना उल्लू सीधा करने वाले राजनेताओं को खूब अच्छी तरह भाँप गये हैं। हिन्दुत्व आन्दोलन का एक और असर यह रहा है कि 1992 से 2002 तक के इसके आक्रमक स्वरूप ने देश में मुस्लिम समुदाय को भी सोचने पर विवश् किया है और इसका आकलन एक गैर हिन्दुत्ववादी पत्रकार मित्र ने करते हुए कहा कि पिछले कुछ वर्षों में देश में साम्प्रदायिक दंगों में काफी कमी आयी है और आतंकवाद के मामले में उसका खुलेआम समर्थन करने का साहस इस्लामी संगठन नहीं कर पा रहे हैं और अनेक बार फतवों द्वारा या अन्य माध्यमों से यह प्रदर्शित किया है कि वे देश में शांति चाहते हैं।

वर्तमान जनादेश की व्याख्या इस रूप में करना कदापि भूल होगी कि यह हिन्दुत्व की पराजय है। यह हिन्दुत्व से अधिक एक दल और उसके नेतृत्व की पराजय है जिसने हिन्दुत्व को सत्ता की सीढी बनाया और सत्ता प्राप्त करने के बाद उसे कूडेदान में डाल दिया।

1989 में आरम्भ हुआ हिन्दुत्व आन्दोलन देश में स्वाधीनता आन्दोलन की अधूरी आकाँक्षा का प्रकटीकरण था। देश को स्वतंत्रता भले ही 1947 में मिली हो परंतु उसका प्रयास करीब एक शताब्दी से चल रहा था और इसकी भूमिका राजा राममोहन राय, बंकिम चन्द्र चटर्जी के आनन्द मठ, स्वामी दयानन्द सरस्वती के आर्य समाज, स्वामी रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द सहित अनगिनत क्रांतिकारियों के प्रयासों से बन चुकी थी। वीर सावरकर ने इंग्लैण्ड के इंडिया हाउस के द्वारा जो प्रयास किया उसकी परिणति अनेक क्रांतिकारी प्रयासों में हुई और इन सभी का स्वप्न एक था अपने देश को अपने सपनों का भारत बनाना एक ऐसा भारत जो महमूद गजनवी के भारत में कदम रखने से पूर्व था वह भारत जो देश में औपनिवेशिक शासन स्थापित होने के बाद आयी व्यवस्था से अपने को मुक्त करेगा। 1989 में भारत में श्री राम जन्मभूमि स्थल पर भव्य मन्दिर निर्माण का आन्दोलन किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं था यह भारत को उसकी चेतना और उसकी पहचान से जोड्ने का आन्दोलन था इसी प्रकार धारा 370 को हटाना और देश में समान नागरिक संहिता का कानून बनाने की चेतना उस चेतना का विस्तार है जो कहती है कि इस देश में रहने वाले एक हैं, उनके पूर्वज एक हैं और इस देश में एकता और समृद्धि तभी आयेगी जब देश के सभी नागरिक एक ही चेतना और एक ही उद्देश्य के साथ भारत को जगदगुरु बनाने की दिशा में प्रवृत्त होंगे।

देश में यह चेतना आज भी विद्यमान है जो राजनीतिक दल कहते हैं कि हिन्दुत्व के आधार पर देश में बहुमत नहीं मिल सकता वे यह भूल जाते हैं कि उनकी हिन्दुत्व में कभी आस्था ही नहीं रही। उनके लिये यह एक आन्दोलन नहीं सत्ता तक पहुँचने की सीढी थी। उन्होंने भारत को कभी एक हिन्दू इकाई में रूप में देखा ही नहीं उन्होंने भी अन्य जातिवादी दलों की भाँति हिन्दुओं को जातियों में बाँट कर देखा और सवर्ण, अवर्ण, अनुसूचित और आदिवासी की राजनीति की। जनता ने हिन्दुत्व के नाम पर जिन दलों को देश की सर्वोच्च सत्ता दी उनके मन में रामराज्य का वह अधूरा स्वप्न था जो कभी गान्धी जी ने दिखाया था। जनता ने जब हिन्दुत्व के नाम पर राजनीतिक दलों को सत्ता सौंपी तो अपने सपने, अपना विश्वास और अपनी भावनायें सौंपी थी लेकिन उन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने विश्वास, सपने और भावनाओं की निर्मम ह्त्या होते देखा।

आज चुनाव हारने के बाद जो राजनीतिक दल अपनी हार का कारण बडी बेशर्मी से हिन्दुत्व को बता रहे हैं या जो हिन्दुत्व की नयी परिभाषायें गढ कर उसे विकास से जोड रहे हैं या फिर हार का कारण किसी नरेन्द्र मोदी को बता रहे हैं उन्हें पता ही नहीं है कि उनकी पहचान क्या है और उनसे जनता की अपेक्षा क्या है? 1989 से 1999 का दशक यदि हिन्दुत्व के उत्कर्ष का काल था और देश में रामराज्य के अधूरे स्वप्न को प्राप्त करने की जनाआकाँक्षा का दशक था तो 1999 से 2009 जनता के इस विश्वास की हत्या और आस्थाओं के दरकने का दशक है। कुछ राजनीतिक दलों ने केवल विश्वास नहीं तोडा है वरन उन्होंने श्रीराम का भी अपमान किया है। सरयू के तट पर हाथ में पवित्र सरयू का जल लेकर श्रीराम की सौगन्ध खाकर उसे तोडना कितना शर्मनाक है। मुझे आज तक स्मरण है कि 1996 के लोकसभा चुनावों से पूर्व तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हाराव ने कहा था कि हम भाजपा से तो लड सकते हैं लेकिन राम से नहीं लड सकते और राम उनके साथ हैं। लेकिन इस दल ने सबसे पहले राम को छोडा तो राम ने इनको छोड दिया। जो दल राम को सत्ता की सीढी का माध्यम मानता हो और उसका प्रधानमंत्री विश्व हिन्दू परिषद के लोगों से कहें कि कब तब राम मन्दिर को घसीटोगे या उसकी एक वरिष्ठ नेत्री कहें कि राम मन्दिर मुद्दा एक बार कैश हो चुका है और एक चेक दो बार कैश नहीं होता उस दल की धर्म, संस्कृति और भारत की चेतना के साथ जुडाव को अनुभव किया जा सकता है।

जो लोग इस जनादेश को हिन्दुत्व के विरुद्ध मान कर चल रहे हैं वे भूल कर रहे हैं। यह जनादेश एक परिपक्व जनता का जनादेश है जो न तो सेक्युलरिज्म के नाम पर नग्न मुस्लिम तुष्टीकरण को बर्दाश्त कर रही है और न ही हर चुनाव में धर्म का चेक कैश कराने का नाटक करने वाले ढोंगी राजनीतिक दलों को सहन कर रही है। देश में न तो हिन्दुत्व के विरुद्ध वातावरण है और न ही देश की रामराज्य की आकाँक्षा सुप्त पडी है लेकिन उन राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता अवश्य समाप्त हो चुकी है जो पिछले एक दशक से जनता के विश्वास की ह्त्या करते आये हैं। अब न केवल राजनीतिक दल विशेष वरन उन सामाजिक धार्मिक संगठनों को भी सावधान हो जाना चाहिये जो ऐसे
राजनीतिक दल के पीछे अपनी पूरी ताकत लगाते हैं। इस संगठनों के लिये अब भी अवसर है कि वे हिन्दुत्व के साथ छल करने वाले राजनीतिक दल के साथ सार्वजनिक रूप से अपने सम्बन्ध विच्छेद कर लें क्योंकि यह अंतिम अवसर है इसके बाद उनकी दशा भी महाभारत के भीष्म और द्रोणाचार्य की हो जायेगी। यदि अब किसी ने भी पुराने चेहरों और पुराने राजनीतिक दल के साथ हिन्दुत्व की बात की तो उसे समाज बख्सने वाला नहीं है।

इस देश में हिन्दुत्व आन्दोलन की आवश्यकता है और इस बात को सभी अनुभव करते हैं। जो लोग अपनी छवि के कारण सार्वजनिक रूप से इसे स्वीकार नहीं करते वे भी मानते हैं कि भारत के अस्तित्व और स्वरूप को बचाये रखने के लिये आवश्यक है कि देश में हिन्दुत्व एक शक्ति के रूप में रहे। इसलिये हिन्दुत्ववादी शक्तियों के लिये यह चुनौती का अवसर है और उन्हें कुछ कठोर निर्णय लेने की आवश्यकता है। उन्हें यह निर्णय करना है कि वे भारत में सदियों से चली आ रही हिन्दुत्व की परम्परा के वाहक के रूप में अपने दायित्वों का पालन करना चाहते हैं या फिर एक राजनीतिक दल के साथ ही अपनी पूरी ऊर्जा नष्ट करना चाहते हैं।

क्यों हारी भाजपा ?

May 17, 2009 · Filed Under अवर्गीकृत · 2 Comments 

चुनाव परिणाम आ चुके हैं और सारी स्थितियाँ स्पष्ट हो चुकी हैं। लेकिन यह जनादेश एक मायने में अत्यंत रोचक है। कांग्रेस 1989 के अपने आँकडे से आगे बढ गयी है जब उसे 197 सीटें मिली थी और भाजपा 1991 के अपने आँकडे के आस पास पहुँच गयी है लेकिन दोनों में अंतर यह है कि 1989 की कांग्रेस अपने पराभव पर थी और 1991 की भाजपा अपने उद्भव पर थी पर आज स्थिति पूरी तरह उलट गयी है। भाजपा के लिये यह आँकडा उसे उदास करता है और उसके पतन की कहानी कहता है तो कांग्रेस के लिये यह आँकडा उसके पुनरोत्थान की कहानी बयाँ करता है। लेकिन दोनों ही दलों के लिये समय नयी शुरुआत का है। यह बात और है कि कांग्रेस उसके लिये तैयार है और भाजपा उस आरम्भ से डरती है। यह आरम्भ है नये नेतृत्व का। कांग्रेस को इस बात में कोई दुबिधा नहीं है कि उसका अगला नेता कौन होगा लेकिन भाजपा पिछले कई वर्षों से इस प्रक्रिया को रोक कर रखे है। पहले आडवाणी को प्रधानमंत्री घोषित करना और फिर् दिल्ली प्रदेश में भाजपा का अध्यक्ष एक बुजुर्ग व्यक्ति को बनाना यही प्रमाणित करता है कि भाजपा नयी पीढी के नेतृत्व की आपसी लडाई की भयावह कल्पना से इस कदर भयभीत है कि बुजुर्गों के सहारे इस लडाई पर एक कृत्रिम आवरण डाले हुए है।

2007 में गुजरात के चुनाव परिणामों के उपरांत मैंने अपने विश्लेषण में कहा था कि मोदी की विजय से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह और लालकृष्ण आडवाणी इस कदर भयभीत हो गये थे कि आनन फानन में बिना किसी भूमिका के आड्वाणी को देश का अगला प्रधानमंत्री पद का भाजपा का प्रत्याशी घोषित कर दिया गया। इस निर्णय पर संघ परिवार भी सहमत हो गया क्योंकि उसे भी पता था कि नये नेतृत्व की लडाई कहीं अधिक भयावह होगी और ऐसे में 2009 में भाजपा की सत्ता में वापसी की सम्भावना धूमिल हो जायेगी। लेकिन बात वहीं से बिगड्नी आरम्भ हो गयी। जिस आडवाणी को उनकी ही पार्टी और संघ परिवार ने जिन्ना के मामले पर भाजपा के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने को विवश कर दिया था और समाज में उनके व्यक्तित्व को धराशायी कर दिया था उनको ही फिर से देश का नेता स्वीकार करने को समाज को विवश किया। इस सोच के पीछे कहीं न कहीं संगठन का यह अहंकार कार्य कर रहा था कि इतना बडा संगठन फिर से समाज की सोच को बदल देगा और आडवाणी स्वीकार्य हो जायेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

भाजपा ने विधानसभा चुनावों में आतंकवाद के मुद्दे को जोरशोर से उठाया लेकिन मुम्बई में हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद भी दिल्ली जैसे महानगर में सत्ता प्राप्त करने में असफल रहने के बाद लोकसभा चुनावों में अपनी रणनीति बदल दी और आतंकवाद के मुद्दे से पूरी तरह परहेज किया। इसी प्रकार भाजपा की पराजय का कारण पूरे पाँच वर्षों में उसकी संभ्रम की स्थिति के कारण उसके प्रति एक नकारात्मक छवि का निर्माण होना रहा। जैसे संसद सत्र के दौरान अधिक समय मुद्दों को उठाने के स्थान पर संसद के बहिष्कार पर जोर देना, राष्ट्रपति चुनाव के दौरान सकारात्मक विपक्ष की भूमिका न निभाकर एक गलत रणनीति अपनाकर नकारात्मक सन्देश देना।

भाजपा ने 2004 के चुनावों के उपरांत इस बात पर अधिक ध्यान नहीं दिया कि कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गान्धी के तथाकथित प्रधानमंत्री पद के त्याग के बाद कांग्रेस की छवि आम जनता के मन में एक सकारात्मक राजनीतिक दल के रूप में उभरी थी और इस छवि को तोड्ने का कार्य भाजपा नहीं कर सकी। 2004 के बाद भाजपा कभी भी स्वयं को सकारात्मक विपक्ष के रूप में अनुभव न कर सकी और मुद्दों के आधार पर राजनीतिक शिक्षण के द्वारा अपनी खोई जमीन प्राप्त करने के स्थान पर शार्ट कट का रास्ता तलाशती रही। उदाहरण के लिये अमेरिका के साथ भारत की परमाणु सन्धि के मामले में भाजपा की रणनीति पूरी तरह दिशाहीन रही। जिस करार को एक प्रगतिशील कदम माना गया और जिसका समर्थक वर्ग वही था जो भाजपा का ही समर्थक वर्ग माना जाता है उसके बीच एक बार फिर भाजपा ने नकारात्मक विपक्ष की छवि बनायी। इसके बाद अगला कदम संसद में वोट के बदले नोटकाण्ड था जिसका प्रबन्धन इतना घटिया हुआ कि फिर यह पार्टी हँसी का पात्र बन कर रह गयी। इन प्रबन्धनों के फ्लाप होने का सबसे बडा कारण यह था कि भाजपा ने अपने को जनप्रतिनिधि राजनीतिक दल के स्थान पर प्रबन्धन मूलक राजनीतिक दल के रूप में परिवर्तित कर लिया है।

यही सोच चुनाव के प्रबन्धन में भी नजर आयी। भाजपा के तथाकथित वार रूम में जो चुनाव प्रबन्धन अपनाया गया वह पूरी तरह विनाशकारी रहा। एक तो प्रमुख रणनीति यह रही कि विचारधारा को स्पर्श न किया जाये ताकि अल्पसंख्यक मत भाजपा के विरुद्ध एकजुट न हो और अल्पसंख्यकों के बिखराव में भाजपा की सफलता देखी गयी अर्थात स्वय़ं के पुरुषार्थ से अधिक दूसरों की कमजोरी का लाभ उठाकर विजित होने की चेष्टा। यदि चुनाव प्रबन्धन को वार रूम कहा गया था तो युद्ध का पहला नियम है कि शत्रु को अपनी भूमि पर लाकर युद्ध किया जाता है। भाजपा ने अपनी रणनीति में पूरा चुनावी युद्ध कांग्रेस की भूमि पर जाकर लडा और कांग्रेस को रक्षात्मक करने के स्थान पर उसे आक्रामक होने का अवसर दिया। उदाहरण के लिये पूरे पाँच वर्ष भाजपा कहती रही कि कांग्रेस आतंकवाद पर नरम है और यह बात देश में हुए अनेक विस्फोटों के बाद देश के अधिकाँश लोग मान भी रहे थे परंतु भाजपा के एजेण्डे से यह मुद्दा लोकसभा चुनाव में गायब था। विडम्बना तो यह है कि आतंकवाद पर कांग्रेस ने भाजपा को घेर लिया क्योंकि भाजपा ने आतंकवाद पर वह तेवर नहीं अपनाये जो कांग्रेस का पसीना छुडा सकते थे क्योंकि वार रूम के कुछ सदस्य मानते थे कि भाजपा को ऐसी कोई बात नहीं करनी चाहिये जिससे अल्पसंख्यक इस दल के विरुद्ध एकजुट हों। इस चुनाव में विचारधारा की बात न करके भाजपा ने स्वयं को कांग्रेस की श्रेणी में लाकर खडा कर लिया ।

इसी प्रकार भाजपा ने कमजोर प्रधानमंत्री का मुद्दा उठाया लेकिन आडवाणी जी ने देश को यह नहीं बताया कि वे कठोर कैसे हैं। यदि बिजली, सड्क पानी ही कठोर प्रधानमंत्री देगा तो मनमोहन सिंह ही क्या बुरे हैं जो जैसे तैसे सरकार तो चला ही रहे थे। भाजपा यह नहीं बता पाई कि मनमोहन कमजोर क्यों हैं और आडवाणी कठोर क्यों हैं?

इस चुनाव में पहली बार प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी जो स्वयं को कठोर कह रहा था वह न तो विदेश नीति की बात कर रहा था, न सुलग रहे पाकिस्तान से भारत को बचाने की रणनीति बता रहा था और न ही विश्व बिरादरी में भारत की हनक बढाने का कोई स्वप्न दिखा रहा था जबकि उसका मतदाता अधिकतर वही है जो भारत को सुपर पावर के रूप में देखना चाहता है। इसके विपरीत यह चुनाव भाजपा ने ऐसे लडा मानों एक साथ पूरे देश के राज्यों के विधानसभा चुनाव हो रहे हों। राज्यों में वोट अपने मुख्यमंत्रियों के काम के आधार पर माँगे जा रहे थे । अब यदि लाडली योजना चलाने के लिये ही देश का प्रधानमंत्री चुनना है, किसानों की कर्ज माफी को ही चुनाव का आधार बनाना है तो मनमोहन सिंह का प्रदर्शन प्रधानमंत्री के रूप में कहाँ बुरा रहा है?

पूरे चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा देश के मतदाताओं से अधिक टीवी चैनल और अंग्रेजी समाचार पत्रों में अपनी छवि और उसके फीड बैक पर आश्रित रही। वरुण गान्धी के मामले में भाजपा का रवैया पूरी तरह असमंजस का रहा। या तो भाजपा चुनाव आयोग की सलाह मान लेती या फिर उन परिस्थितियों पर बहस चलाती जिनके चलते वरुण ने ऐसा बयान दिया। लेकिन ऐसा करने के स्थान पर भाजपा के नेता एक ओर तो कहते रहे कि उत्तर प्रदेश में हम इस विषय़ पर आन्दोलन चलायेंगे और वहीं दूसरी ओर जमीन पर कार्यकर्ताओं को ऐसा कुछ करने से रोकते रहे। भाजपा को उत्तर प्रदेश से बहुत उम्मीदे थीं परंतु उसकी उम्मीद का आधार मुस्लिम वोटों का बँटवारा था लेकिन ऐसा नहीं हुआ और आजम खान के सपा से नाराज होने के बाद यह वोट कांग्रेस को चला गया और भाजपा यह आशा लगाये रही कि बसपा से असंतुष्ट सवर्ण भाजपा में आ जायेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ और यह वोट भी कांग्रेस के खाते में चला गया। भाजपा उत्तर प्रदेश में जिस मुस्लिम वोट को अपने विरुद्ध गोलबन्द होने से रोकना चाहती थी उसे वह रोक नहीं सकी क्योंकि मुस्लिम मतदाताओं ने आडवाणी को रामरथ की छवि से कभी मुक्त नहीं किया लेकिन आडवाणी के सलाहकारों ने उन्हें यह विश्वास दिला दिया था कि पाकिस्तान के मुसलमानों में अपनी पैठ बनाकर वह भारत के मुस्लिम समाज का दिल जीत लेंगे। इसीलिये आडवाणी गुजरात की जनसभाओं में जनता को यह नारा लगाने से रोकते रहे कि जो हिन्दू हित की बात करेगा वही देश पर राज करेगा और कहा कि हिन्दू हित नहीं राष्टृहित की बात करो। इसके साथ ही उन्होंने एक प्रसिद्ध टीवी चैनल को साक्षात्कार देकर कहा कि अभी तक हम कहते थे कि किसी का तुष्टीकरण नहीं लेकिन अब मेरा नारा है कि किसी के साथ भेदभाव नहीं। पूरे चुनाव प्रचार में लौह पुरुष की इस बदलती छवि से लोग आश्चर्यचकित थे।

एक और कारण जिस पर चुनाव प्रबन्धन में अधिक जोर दिया गया वह है ओवर एक्सपोजर। जो लोग कहते हैं कि टीवी चैनल भाजपा विरोधी अभियान में लगे रहे उनसे मैं सहमत नहीं हूँ क्योंकि मीडिया ने भाजपा को अधिक कवरेज दिया और भाजपा के नेता विशेष रूप से प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी लालकृष्ण आडवाणी की मीडिया से सहज उपलब्धता ने उनके व्यक्तित्व को हल्का कर दिया। राजनीतिक दलों ने अब भी तथाकथित मुख्यधारा की मीडिया के मुकाबले स्थानीय और क्षेत्रीय भाषाई मीडिया की उपयोगिता नहीं समझी है।

आडवाणी जी ने भाजपा को हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी से मध्यमार्गी पार्टी बनाने का प्रयास किया लेकिन उनके इस प्रयास को जनता ने नकार दिया। अब भाजपा ऐसे मोड पर खडी है जहाँ से उसके लिये दो रास्ते जाते हैं एक तो यथास्थिति बनाये रखते हुए अपने क्षरण को बरकरार रख कर तब तक प्रतीक्षा करना जब तक वह पूरी तरह समाप्त न हो जाये या फिर देश में विचारधारा के अपने क्षेत्र को फिर से वापस प्राप्त करना। भाजपा को दूसरे रास्ते पर लाने के लिये पार्टी से बाहर के तत्वों को भी कुछ कठोर फैसले लेने होंगे।

क्या वरुण ने कुछ गलत कहा?

March 19, 2009 · Filed Under हिन्दुत्व · 5 Comments 

पिछले चौबीस घण्टों में वरुण गान्धी चर्चा में आ गये हैं। कारण ऐसा कि कुछ लोग उससे सहमत हो सकते हैं और कुछ लोग नहीं। लेकिन वरुण गान्धी के जिस भाषण को लेकर चर्चा है और उन्हें चुनाव आयोग का नोटिस भी मिल चुका है उसे लेकर अनेक प्रतिक्रियायें हैं। भाजपा जहाँ इस मामले में फूँकफूँककर कदम आगे बढा रही है वहीं समाज में इसे लेकर दो तरह का विचार है। एक खेमा तो ऐसा है जो इसे राजनीतिक दृष्टि से उचित नहीं मानता वहीं एक ऐसा वर्ग भी है जो इसे लेकर अत्यंत उत्साहित है। अनेक समाचार पत्रों की वेबसाइट पर यह विभाजन स्पष्ट दिखाई दे सकता है। भाजपा आधिकारिक रूप से इसे भले ही वरुण गान्धी और चुनाव आयोग के मध्य मामला मानती हो पर सामान्य रूप से पार्टी को वरुण के इस तेवर से अधिक दिक्कत नहीं दिखती। लेकिन वरुण गान्धी के ऊपर जिस प्रकार देश के प्रमुख दलों और मीडिया ने प्रहार आरम्भ कर दिया है उसने देश में एक बार फिर सेक्युलरवाद के एकांगी स्वरूप को स्पष्ट किया है।

कांग्रेस ने वरुण के बयान को सेक्युलर सिद्धांतों के विपरीत और नरेन्द्र मोदी से कहीं अधिक खतरनाक बताया है। इसी के साथ मीडिया भी सेक्युलर सिद्धांत का हवाला देकर वरुण पर पिल पडा ऐसा लगा मानों अभिमन्यु को कौरवों ने चक्रव्यूह में घेर लिया हो। वरुण ने अपने बयान की सफाई देते हुए मीडिया के सामने अपने उन दोनों बयानों का सच रखा जिसे मीडिया लगातार दिखा रहा है। एक भाषण जो उन्होंने सार्वजनिक रूप से दिया उसके बारे में उनका कहना है कि इसमें उनकी आवाज के साथ छेड्छाड की गयी है और दूसरे भाषण में जिसमें असामाजिक तत्वों को उन्होंने चेतावनी दी है उसे उन्होंने स्वीकार किया है। अधिक संतोषजनक बात यह है कि अपने तेवर और मुद्दों को लेकर वरुण ने मीडिया के दबाव में आये बिना उसे बरकरार रखा। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या वरुण ने कुछ गलत कहा? ऐसा नहीं लगता। क्योंकि वरुण ने कुछ सवाल उठाये हैं जो पिछले अनेक वर्षों से चर्चा में रहे है और उनमें से एक है देश में हिन्दुओं के मध्य बढ रही असुरक्षा की भावना। वरुण गान्धी ने स्पष्ट किया कि वे एक सीमांत क्षेत्र से आते हैं और यहाँ कुछ मोहल्ले हथियारों की तस्करी का अड्डा बन चुके हैं जो देश की सुरक्षा के लिये खतरा हैं। इसके साथ ही वरुण के भाषण में वोटबैंक के चलते हिन्दुओं के मुद्दे से परे रहने की प्रवृत्ति भी रेखाँकित होती है। वरुण गान्धी ने केवल देश के ऐसे क्षेत्र की समस्या को वाणी दी है जहाँ सामाजिक संतुलन बिगड रहा है और हिन्दुओं की अनदेखी की जा रही है।

जिस प्रकार वरुण गान्धी के भाषण को मुद्दा बनाया जा रहा है उसके पीछे दो कारण स्पष्ट रूप से दिखाई देते है। एक तो राजनीतिक दृष्टि से भाजपा को घेरने के लिये इसे तूल दिया जा रहा है ताकि चुनाव को साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत किया जा सके और भाजपा को साम्प्रदायिक सिद्ध किया जा सके। यह बात और है कि ऐसी रणनीति सदैव भाजपा के विरोधियों को भारी पड्ती है। इसके साथ ही इस पूरे मामले के द्वारा वरुण गान्धी के मनोबल को तोड्ने का प्रयास हो रहा है ताकि उसे हतोत्साहित किया जा सके जिससे या तो वह अपनी लय छोड दे या मुद्दा छोड दे। दूसरे प्रयास के प्रति कोई भी रणनीति वरुण गान्धी को स्वयं बनानी होगी और यही उनकी परीक्षा होगी कि राजनीति में वे कितना आगे जायेंगे। वैसे इतना तय है कि वरुण ने अपने तेवरों से दिखा दिया है कि उन्हें मुद्दों की समझ भी है और देश के प्रति उन्हें चिंता भी है और वोटबैक की गुलाम राजनीति की जड्ता को तोड्ने का जो साहस उन्होंने दिखाया है उससे उनकी लोकप्रियता में वृद्धि ही होने वाली है।

वैसे कांग्रेस और अन्य दलों का वरुण गान्धी पर आरोप और भी हास्यास्पद तब लगता है जब इन राजनीतिक दलों का इतिहास हम देखते हैं। शाहबानो के मामले में मुस्लिम समाज के दबाव के आगे संविधान में संशोधन करना, बिहार के विधानसभा चुनावों में लोक जनशक्ति के अध्यक्ष रामविलास पासवान का ओसामा बिन लादेन जैसे दिखने वाले व्यक्ति को लेकर प्रचार करना, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के शासनकाल में एक मंत्री का डेनमार्क के कार्टूनिस्ट के सिर पर एक करोड का इनाम घोषित करना, केन्द्र की सरकार के कैबिनेट मंत्री ए.आर. अंतुले का पाकिस्तान के सुर में बोलते हुए एटीएस प्रमुख की हत्या पर सवाल खडे करना, मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह का जामिया विश्वविद्यालय के कुलपति का आतंकवाद के आरोपी छात्र के लिये विश्वविद्यालय से धन एकत्र करने सम्बन्धी अभियान का समर्थन करना, केन्द्र सरकार के सहयोगी दलों का सिमी की खुले आम पैरवी करना आखिर साम्प्रदायिकता की श्रेणी में क्यों नहीं आता?
जब मुस्लिम संगठन खुले आम सरकार द्वारा मोहनचन्द्र शर्मा को अशोक चक्र दिये जाने का विरोध करते हैं और बाटला हाउस मुठभेड की सीबीआई से जाँच की माँग करते हैं तो इसे साम्प्रदायिक क्यों नहीं माना जाता। क्या केवल इसलिये कि यह माँग मुस्लिम समाज कर रहा है। जब रामविलास पासवान खुले आम बांग्लादेशी घुसपठियों को नागरिकता देने की माँग करते हुए राष्ट्रविरोधी बात करते हैं तो न तो मीडिया में बहस होती है और न सेक्युलरवादी शोर मचाते हैं केवल इसलिये कि यह मामला मुसलमानों से जुडा है। जब अरुन्धती राय खुले आम कश्मीर को भारत का अंग मानने से इंकार करती हैं तो इस पर बहस नहीं होती और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बताया जाता है। क्योंकि अरुन्धती राय वामपंथी हैं और सदैव मुसलमानों के हित में बोलती हैं। क्या केवल साम्प्रदायिकता हिन्दुओं की रक्षा और सम्मान से जुडे विषयों को उठाने में ही झलकती है?

यदि इस देश में मुस्लिम समाज अपनी शिकायत सरकार से उलेमा एक्सप्रेस चला कर कर सकता है और मुस्लिम उत्पीडन का रोना रोकर आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार युवकों के लिये मुआवजे की माँग कर उन्हें महिमामंडित कर सकता है और उन्हें ऐसा करने की पूरी छूट मिलती है तो फिर हिन्दुओं से जुडे विषय उठाने पर इतना हो हल्ला क्यों? वरुण गान्धी ने बिलकुल ठीक कहा है कि हिन्दुओं से जुडी बात करने पर या हिन्दू स्वाभिमान का विषय उठाने वालों को साम्प्रदायिक घोषित करने का राजनीतिक षडयंत्र देश में चल रहा है और सेक्युलरवाद के नाम पर इसे बढाया जा रहा है। नेताओं और मीडिया को यह बात समझनी चाहिये कि पीलीभीत में वरुण गान्धी और गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ परिस्थितियों की उपज हैं जो हिन्दुओं की रक्षा करना चाहते हैं और अभी तक भारत के संविधान ने हिन्दुओं की रक्षा को अपराध घोषित नहीं किया है।

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