विश्व राजनीति पर प्रसंगवश

आम तौर पर विश्व राजनीति पर मेरा आकलन या भविष्यवाणी सत्य सिद्ध होती है , यह किसी ज्योतिषी की तरह नहीं होती वरन इतिहास और राजनीति के विद्यार्थी के तौर पर होती है| 2007 में जब सारी दुनिया बराक ओबामा के लिए पागल थी और उन्हें दुनिया में परिवर्तन का प्रतीक् मानकर चल रही थी , उसी दौरान कनाडा के एक आन लाइन समाचार पत्र के साथ साक्षात्कार में मैंने ओबामा का विरोध किया था और यह भविष्यवाणी की थी कि उनके अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद दुनिया वैसी नहीं रहेगी जैसी कि उस समय थी, विशेषकर इस्लामवाद के प्रति उनकी सोच एक विशेष विचारधारा के प्रति झुकाव रखती है और वे पश्चिम एशिया से दक्षिण एशिया तक इस समस्या को और उलझा देंगे | अरब देशों में हुई हलचल के बाद अमेरिका के रुख ने समस्त मध्य पूर्व में आतंकवाद और इस्लामवाद की समस्या को प्रथम विश्व युद्ध में ओतोमन साम्राज्य के पतन के बाद आरंभ हुए इस्लामवादी अन्तर्संघर्ष के साथ और अधिक उलझा दिया है|
मैं यह बात इसलिये दुहरा रहा हूँ कि ब्रिटेन में हुए आम चुनाव के बाद आए रिज़ल्ट ने मेरी इस धारणा को पुष्ट किया है कि यूरोप एक गंभीर संकट से गुजर रहा है| यूरोपियन संघ का प्रयोग संकट में है, आर्थिक सम्पन्नता के सहारे यूरोप के निवासियों को उनकी सदियों पुरानी ऐतिहासिक, नस्ली और राष्ट्रवादी पहचान से दूर् रखने का प्रयोग अब सफल नहीं है| स्कातलैंड की राष्ट्रीय पार्टी को मिली अभूतपूर्व सफलता ने ब्रिटेन के ग्रेट ब्रिटेन के अस्तित्व पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है| साथ ही कंजर्वेटिव कैमरून ने भी यूरोपियन संघ में ब्रिटेन के रहने या न रहने पर 2017 में देश में जनमत संगृह की बात कह रखी है| उन्हें आप्रवास विरोधी या इस्लामवाद के विरूद्ध अधिक सख्त होना पड़ा ताकि यू के इंडिपेंडेंट पार्टी के प्रभाव को कम कर सकें|
इस चुनाव में लेबर डेमोक्रेट निक क्लेग ने अपनी विचारधारा से समझौता किया था और कंजर्वेटिव से हाथ मिलाया था इस कारण उनका सफाया हो गया| विचारधारा पर आधारित कोई ताकत यदि चुनाव के बाद जरूरत से ज्यादा व्यावहारिक हो जाती है तो जनता उसे साफ़ कर देती है|
कैमरून भले ही फिर से विजयी हुए हों पर उनकी स्थिति भी 2007 के बराक ओबामा जैसी होगी जो ग्रेट ब्रिटेन के बचे खुचे साम्राज्य और उसकी छाया को भी समेटने वाले नेता के रुप में याद किए जायेंगे जैसा कि लार्ड माउंटबेटन के साथ हुआ था| जिस कंजर्वेटिव पार्टी के चर्चिल ने गाँधी जी को ” अधनंगा फ़कीर ” कहा था उसी पार्टी के कैमरून को चुनाव से पूर्व गाँधी जी की प्रतिमा लगवानी पड़ी, भारतीय मूल के लोगों को अपने टिकट से चुनाव लड़वाना पड़ा |समय की गति से कोई बच नहीं सकता , कर्मों का फल सभी को भुगतना पड़ता है फिर वह व्यक्ति हो या देश| ऐसे में हमारा दायित्व है कि हम दूसरों के पीछे चलने और उनका सर्टिफिकेट लेने के बजाय अपना रास्ता तलाशें, अपने को सशक्त करें और अपनी आध्यात्मिकता की शक्ति को अपनी राष्ट्रवाद की शक्ति बनायें जो हमारी ताकत रही है|